Wednesday, September 09, 2026

श्री बद्रीनाथ यात्रा नवंबर 2026

श्री बद्रीनाथ यात्रा - नवंबर 2026

पिछले कुछ वर्षों से हर साल अक्टूबर-नवंबर में श्री बद्रीनाथ धाम जाना एक नियम सा बन गया है। पहली यात्रा 2008 में की थी, तब से ये सिलसिला लगातार जारी है - 2010, 2012, 2015, 2018, 2020, 2022, 2023, 2024, 2025 और अब 2026 की तैयारी है।

शुरुआत में 2008 में घर से टाटा सूमो बुक करके 12-13 लोग गए थे। उसके बाद 2020 तक ज्यादातर यात्राएं पब्लिक ट्रांसपोर्ट / बसों से ही हुईं। 2020 में एक यादगार यात्रा अपनी स्प्लेंडर बाइक से की, साथ में विद्यालय के साथी सुनील अत्रि जी थे, जिस पर मैंने विस्तार से लिखा भी है।

2024 में गाड़ी लेने के बाद 2025 की यात्रा अपनी गाड़ी से की, तब छोटा बेटा और तीन अन्य साथी साथ थे। तभी तय किया था कि अगली यात्रा सपरिवार अपनी गाड़ी से करेंगे।

इस बार साथ चलने वालों की इच्छा है:
मोहित कौशल (पिल्लूखेड़ा, वर्तमान में रोहतक) अपनी गाड़ी से सपरिवार जाना चाहते हैं, उनकी गाड़ी में 2-3 जगह खाली है। मेरे साथी शिक्षक श्री रामनारायण जी और भतीजा रक्षित भी इच्छुक हैं। राकेश सांगवान जी भी अपनी गाड़ी से जा सकते हैं, तो उनकी गाड़ी में भी 1-2 लोग एडजस्ट हो सकते हैं।

अभी सितंबर है और यात्रा नवंबर में प्रस्तावित है। 20 अक्टूबर, दशहरे के दिन कपाट बंद होने की तिथि घोषित होगी, उसके बाद ही यात्रा की अंतिम तिथि तय करूँगा। फिलहाल मन नवंबर के दूसरे शनिवार की छुट्टी का उपयोग करने का है।

नवंबर में भीड़ कम रहती है और बर्फ मिलने की संभावना भी अधिक रहती है, इसलिए यही समय सबसे उत्तम लगता है।

अपने अंदर के बच्चे को मरने न दें

एक स्टेटस लगाया था मैंने जिसमें कुछ युवा सड़क पर ट्रक के हॉर्न पर नागिन डांस कर रहे थे।

इस स्टेटस पर कई मित्रों के संदेश आए जो ये दर्शाते थे कि ऐसी मूर्खता को न तो करना चाहिए न बढ़ावा देना चाहिए।

मैं उनकी बातों से कतई असहमत नहीं हूं। वास्तव में सड़क पर इस तरह की मस्ती नहीं होनी चाहिए वो भी बारिश के मौसम में। क्या हो अगर ट्रक के ब्रेक देर से लगें या ट्रक वाले का मूड खराब हो?

दसियों घरों के चराग एक झटके में बुझ सकते थे।

लेकिन उस स्टेटस को लगाने का मेरा उद्देश्य कुछ और था। मैं पुनः कहता हूं कि मैं ऐसी मस्ती का कतई समर्थन नहीं करता जिसमें अपनी और दूसरों की जान का जोखिम हो। लेकिन मेरा ये भी मानना है कि हमें अपने अंदर के बच्चे को मस्ती करने की छूट जरूर देनी चाहिए। किसी ट्रक के हॉर्न को सुनकर थोड़ा मटक लेंगे तो कहीं भूचाल नहीं आ जाएगा।

बारिश की बूंदों से अपने तन और मन को भिगो लेने देंगे तो कहीं सुनामी नहीं आ जाएगी।

दुनिया भर का जरूरी गैरजरूरी तनाव तो हम हर वक्त ओढ़े ही रहते हैं ना। क्या हो अगर सब जिम्मेदारियों को, तनावों को, झगड़ों-टंटों को कुछ देर भूल जाएं!

आप गाड़ी से कहीं जा रहे हों, सामने बारात की भीड़ नाच-कूद रही हो। तो बार-बार हॉर्न बजाकर झल्लाने की बजाय यदि कार से बाहर आकर बारातियों के साथ दो ठुमके लगा लेंगे तो तनाव, गुस्सा और झल्लाहट कुछ देर के लिए भूल भी जाएंगे और खुद को तरोताजा भी अनुभव करेंगे। वैसे भी आपके हॉर्न बजाने से उन शराबियों को तो घंटा फर्क नहीं पड़ता।

याद है आपको, आप अंतिम बार अपनी मर्जी से बारिश में कब भीगे थे, कब किसी फंक्शन में खुलकर नाचे थे, कब जी भर कर चिल्लाए थे, कब दिल खोलकर हंसे थे? याद है?

शायद नहीं। क्योंकि हमने इन बातों को बचपना जो समझ लिया है। जबकि बचपना कितना प्यारा अनुभव है ये सब जानते हैं। न जानते होते तो आज भी बचपन को याद करके खुश नहीं होते।

कब तक सुरक्षा के नाम पर, सभ्यता के नाम पर, स्टेट्स के नाम पर और समझदारी के भारी बोझ के नाम पर अपने अंदर के मासूम बच्चे पर जुल्म करते रहेंगे हम!

आइए इस बारिश में भीग जानें दें उस नन्हें को जो आपके भीतर डरा सहमा बैठा है।

आइए किसी बात पर या बिना बात ही खुलकर ठठाकर हंस लेने दें उस नन्हें को जो आपके भीतर उदास बैठा है।

आइए कभी उछल-उछल कर नाच-कूद लेने दें उस नन्हें को जो आपके भीतर दुबका बैठा है।

घुमक्कड़ मन होने के कारण रोमांच मेरा पहला लक्ष्य रहता है। हालांकि जहां रोमांच होगा वहां रिस्क तो होगा ही। हां थोड़ी समझदारी (हालांकि ये समझदारी ही सबसे बड़ी समस्या है) और सावधानी जरूरी है लेकिन रोमांच हमारे जीवन में ताजगी, ऊर्जा और जीवटता भरता है।


ये जीवन अनमोल है। इसे खुलकर, खेलकर, जीभर कर जिएं।

ये दोबारा मिलेगा या नहीं मुझे नहीं मालूम।


-निंबल

शेष स्वरूप श्रीहरि दर्शन

सन 2008 के सितंबर माह की बात है। हम कुल बारह लोग अपनी पहली बद्रीनाथ यात्रा पर थे। टाटा सूमो में मैं अपने चचेरे भाई मुकेश के साथ पीछे की सीट पर बैठा था।
पहली बार ऋषिकेश से आगे आया था। इतने ऊंचे पहाड़ देखकर मन बहुत घबरा गया था।
तिस पर उस समय रास्ते इतने खराब, खतरनाक और डरावने थे कि मेरी जान हलक में आ गयी थी

ऐसा नहीं था कि मैं ईश्वर को न मानता था। लेकिन डर, घुमावदार रास्ते और गाड़ी के हिचकोले मुझे इतना समय ही नहीं दे पा रहे थे कि मैं डर को भूल ईश्वर को याद करूँ और कुछ शांति अनुभव करूँ। मैं बस अपने भाई की गोद में सर रखे घबराया और परेशान हाल सफर पूरा होने को प्रतीक्षित था।

मेरी हालत देख छोटे भाई ने कहा, "भाई! आप ईश्वर को मानने वाले हैं, श्री कृष्ण आपके मन में/जिह्वा पर सदैव विराजते हैं। उन पर भरोसा कीजिये! उन्हें स्मरण कीजिये। निश्चय ही आपको शांति अनुभव होगी।"

भाई की बात सुनकर मैं आंखें बंद करके ईश्वर के रूप को स्मरण करने लगा। आसान तो नहीं था लेकिन प्रभु कृपा से मेरा ध्यान लग गया। अचानक एक दिव्य अनुभव हुआ। शरीर हल्का सा हो गया और सम्भवतः मेरी आँख लग गयी। मुझे गाड़ी तो चलती अनुभव हो रही थी पर ऐसा भी लग रहा था कि मैं सो रहा हूँ और स्वप्न देख रहा हूँ।

मैंने देखा पहाड़ डरावने नहीं लग रहे। चित्त शांत हो गया। फिर एक बहुत बड़ा अजगर या कहिये साक्षात शेषनाग सभी पहाड़ों के ऊपर तैरते हुए मेरी ओर आ रहे थे। मैं बिना किसी भय से उनके दिव्य विराट स्वरूप को निहार रहा हूँ। उनके शरीर पर चमकदार शल्कीय उभार तक मुझे स्पष्ट गोचर हो रहे थे। सामान्य अवस्था में सांप से कोई भी डरता ही है। (हालांकि मैं इस मामले में थोड़ा निडर हूँ और अनेक अवसरों पर सर्पों को हाथों में पकड़ा भी है) लेकिन मुझे न भय अनुभव हो रहा था और न सर्प को सर्प रूप में देख रहा था। वह अलौकिक सर्प हमारी गाड़ी के आसपास, चारों ओर, ऊपर-नीचे देर तक हमारे साथ-साथ हवा में तैरता हुआ चल रहा था।

मेरे शरीर के रोएं धनात्मक आवेश से पुलकित थे। मन की जो स्थिति थी उसे शब्द नहीं दिए जा सकते। ये आनन्द किसी अन्य स्थिति में अनुभव नहीं किया जा सकता।

#देवदर्शन की कोई तुलना नहीं हो सकती।

अचानक भाई की रोमांच से भरी आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी।

“भाई! भाई! उठो! भाई उठो! मैंने अद्भुत स्वप्न देखा।”

मैं हैरान होकर भाई (मुकेश) के चेहरे को देख रहा था। उसके चेहरे पर अद्भुत चमक,  दिव्यता और रोमांच स्पष्ट दिख रहा था।

सब उसकी ओर देखने लगे।

तभी मैंने कहा, “अरे मुझे सुनो पहले। मैंने साक्षात श्रीहरि के दर्शन किये हैं।“

मुकेश- “आपने श्रीहरि को देखा! मैंने साक्षात उनके सेवक शेषनाग जी को देखा।“

मैं- “शेषनाग! तुमने शेषनाग जी को देखा? अरे मैंने देखा उनको तो।“

बाकी सब आश्चर्य से हम दोनों को सुन/देख रहे थे।
स्वप्न के बारे में एक वाक्य मैं बोलता दूसरा मुकेश भाई।
कैसा अचंभा था! दोनों भाइयों ने लगभग एक ही स्वप्न एक ही समय में देखा। दोनों पर स्वप्न का एक जैसा ही प्रभाव था।
वैसी दिव्यता मैंने जीवन में पुनः कभी अनुभव नहीं की। आगे की यात्रा में न भय था न परेशानी। उल्टियां भी बन्द हुई और रास्ते की सुंदरता को भी मैं निहारता हुआ श्री बद्रीधाम पहुंचा। दर्शनों में भी आनन्द आया।
बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में भी एक दिव्य अनुभव हुआ था जिसका वर्णन शायद पहले किसी शृंखला में कर चुका हूँ।

इस प्रकार मुझे जीवन में प्रथम बार मेरे आराध्य से साक्षात्कार का अनुभव हुआ।

जय श्री बदरीविशाल।

-विक्की निम्बल

श्री हरि के धाम पर पांचवीं बारजय बदरीविशाल
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वसुधारा