Wednesday, November 30, 2011

मेरा वो रसीला आम...

नर्सरी में था मैं.अभी नया-नया स्कूल जाने लगा था. नयी वर्दी,नया बस्ता,नया माहौल, यानि मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. बस एक बात सही नहीं लग रही थी कि जो भी करो मास्टरनी जी से पूछ के करो,हुंह!! खैर गर्मियों के दिन थे,आमों का मौसम. मैं आधी छुट्टी में पापा के पास दुकान पर ही आ जाता.हमारी मिठाई की दुकान हुआ करती थी.वहां से मेरा स्कूल कुछ गज दूर ही था.मैं खाना खाता और कुछ मीठा खाकर स्कूल दौड़ जाता.ऐसे ही एक दिन जब मैं वापस स्कूल जा रहा था तो पापा ने सीजन का तोहफा एक दशहरी आम(काफी बड़ा और रसीला) मुझे ले कर दिया और मैं उसे थोडा थोडा खाते हुए स्कूल चला गया.मैंने दूर से ही देखा के कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं खेल रहा था.
मैंने सोचा स्कूल की छुट्टी बंद हो गई है, मैं घबरा गया,मैं आम को लेकर उलझन में पड़ गया के उसका क्या करूं? उसे मैं इतनी जल्दी खा तो नहीं सकता था और स्कूल में ले जाते डर लगता था के कहीं टीचर जी से मार न पड़ जाए.मुझे आव और ताव दोनों ही देखने का वक़्त नहीं मिला. मैंने आम को हसरत भरी निगाह से देखा,आँखों से चूसा और...और  फैंक दिया नाली में................. मैं भाग कर स्कूल के अंदर गया तो देखा सभी बच्चे खेल रहे थे.
मैं सकते में आ गया, यानि मैंने बिना वजह के वो मीठा, रसीला आम नाली में फैंक दिया था? कितना बुद्धू था मैं.बिना आगा पीछा देखे आम को फैंक डाला.मैं दौड़ के बाहर नाली के पास आया,उसमे वो आम अभी आधा ही डूबा था.मगर धीरे-धीरे आम नीचे जा रहा था और मेरी आँखों से आंसू भी.
खैर बरसों बीत गये, अनेक गर्मियां आई और गयी,बहुत सारे आम मैंने खाए. दशहरी भी और सफेदा भी. मगर जो मिठास उस आम में थी वो न दोबारा किसी आम में मुझे मिली न मैं आज तक उसे भूल पाया हूँ. अब चाहे कोई मुझे कितने ही आम दे दे मगर उस आम को खोने का दर्द मुझसे नहीं भूला जाता.

Friday, September 30, 2011

कहाँ खो गयी,हंसी तुम्हारी?


कहाँ खो गयी
हंसी तुम्हारी,
कौन ले गया?


शशिमुख ऊपर
मैलापन सा
कौन दे गया?


कल तक
जब तुम
मुस्काते थे


मादकता
हर इक के मन में,
भर जाते थे.


दंत पंक्ति
जब तुम उज्ज्वल
दिखलाते थे.


अंतस तक के
घोर अँधेरे
मिट जाते थे.


सूनापन सा
कैसा मुख पर
अब छाया है.


रूखा सा
व्यवहार तुम्हारा
हो आया है.


लाली चेहरे वाली
आखिर
कौन ले गया.


नयन कुटी में
गहन उदासी
कौन दे गया.

Saturday, September 10, 2011

कब तक तड़पूं ?

कब तक तड़पूं ?
कितना तड़पूं ?
कोई बताये....
राह सुझाये....
कितना सह लूँ ?
कब तक बहलूँ ?
बहुत हो चुका...
बहुत खो चुका.
कहा कुछ नहीं
सहा बहुत है.
रहा कुछ नहीं
गया बहुत है.
कितना समेटूं?
कब तक सहेजूँ?
कोई सिखाये.....
मुझे बताये.

Monday, June 13, 2011

तेरी याद ने आना छोड़ दिया

तेरी याद ने आना छोड़ दिया,
बेवक्त सताना छोड़ दिया.
ऐसा तो नहीं के भूल गये,
बस लब तक लाना छोड़ दिया.
मुश्किल है तुम बिन जीना पर,
दुनिया को बताना छोड़ दिया.

V. B. Series

Friday, February 11, 2011

आइये प्रोमिस करें.

नीचे कुछ तस्वीरें हैं जिन्हें देख के शायद आप भगवान से शिकायतें करना छोड़ दें.
हो सकता है कुछ लोगो को मेरा ये प्रयास निरर्थक लगे या इन तस्वीरों से घिन आए.
मगर मेरा मन तो बहुत विचलित हो गया ये सब देख कर.आईये आज से हम कुछ
ऐसा करना शुरू कर दें जिनसे किसी ना किसी रूप में हम इन बेबसों और लाचारों की
मदद कर सकें.
इन्हें खाने में स्वाद की नहीं बल्कि खाने की जरुरत है
मेरी मौन श्रद्धांजलि
इनको फैशन से सरोकार नहीं.
कभी सोचा है के ये अपना जीवन कैसे बिताते हैं?
माँ
माँ
दो भूखे
क़यामत
शिकायत है इनको भगवान से
गरीबी
अभाव
बेबसी



इन्हें देखें और विचार करें कि हम भगवान से इस बात कि शिकायत करें कि नहीं कि आज आपको पित्ज़ा मजेदार नहीं लगा,आज आप गाड़ी तेज़ नही भगा पाए,आपको अपनी जींस पसंद नहीं,आपके बाल झड रहे हैं,ब्राड-बैंड की  स्पीड कम है...........आदि.

आज है प्रोमिस डे.
आइये प्रोमिस करें.

Monday, February 07, 2011

क्या संसार बचेगा?

(नास्त्रेदमस)
टी. वी. पर अक्सर चर्चा आती रहती है कि क्या संसार बचेगा? माया कैलंडर और नास्त्रेदमस के अनुसार 28 दिसम्बर 2012 को संसार नष्ट हो जायेगा.
माया लोग कोलंबस की 1482 में अमरीकी खोज तक भारत से 10 गुना बड़े एरिया पर हजारों बरसों तक राज करते रहे.उन्हें यूरोपीय गोरों ने जमीन व सोने के लालच में स्पेनी लुटेरे सेनापति पिजारो ने समाप्त कर दिया. उन्होंने खुद का विनाश 200 वर्ष पूर्व देख लिया था. फिर 1520 में फ्रांसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी सामने आई.पहले यूरोपीयन भारत को ओरिएंट कहते थे.उन्होंने लिखा है 1950 के बाद ओरिएंट (भारत) में एक शक्तिशाली महिला शासक आएगी.बाद में पतन का शिकार होगी.फिर विरोधियों की फूट से दोबारा सत्ता में आएगी.वह 67 वर्ष की आयु में अपने घर में अपने अंगरक्षकों द्वारा मारी जाएगी.तब सदी बदलने में 16 वर्ष  रह जायेंगे.
1520 में इंदिरा जी व उनके पूर्वजों पंडित जवाहर लाल नेहरु,मोती लाल नेहरु व गंगाधर का नामो निशान तक नहीं था.उसने हिटलर व उसके कारनामों को 400 वर्ष पूर्व ही लिख दिया था.नाम हिस्टर लिखा.फिर लिखा कि नये देश (अमेरिका) के न्यूयार्क शहर में दो धातु के पक्षी चौरस मीनार जैसे खम्बों जैसी इमारतों से टकरायेंगे और नष्ट कर देंगे.उत्तर का मंगोल देश (चीन) अति शक्तिशाली बन कर दूसरों का जीना हराम कर देगा.उसको ओरिएंट (भारत),नया देश (अमेरिका) व रूस मिलकर हराएंगे.संसार का भयानक विनाश होगा.क्या कोई 25 वर्ष पूर्व सोच सकता था कि चीन 25 वर्ष बाद अर्थात 2010 में संसार की दूसरी आर्थिक और तीसरी सैनिक शक्ति बन जायेगा?
इस्लाम का भी पक्का विश्वास क़यामत में है.उनके ग्रंथों में क़यामत का काफी ज़िक्र है.बाईबल की कहानियों में भी क़यामत का काफी वर्णन है.यह भी कहा गया है कि क़यामत आती जाती रहेगी.
आबादी अंधाधुंध बढ़ रही है.हर 22 वर्ष में डबल हो रही है.1947 में हम 20 करोड़ थे आज 135 करोड़ हैं.तब जिस जमीन पर 1 आदमी था आज 7 हैं और 2032  मे 14 होंगे.
पंजाब के महाबली महाराजा रणजीत सिंह का राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी से रोपड़ की संधि के बाद तय हुआ था.वर्तमान पकिस्तान का सिंध व बलूचिस्तान का कुछ भाग छोड़ कर सारा पकिस्तान जैसे सिंध,बलूचिस्तान,पंजाब,दर्रा खैबर तक सूबा सरहद,जम्मू-कश्मीर,गिलगित,हुजा,चित्राल,लद्दाख,भारतीय पंजाब के जिले अमृतसर,जालंधर,होशियारपुर.इनमे टोटल 69 लाख की आबादी थी.आज उसी एरिया में 16 करोड़ की आबादी है.
(प्लेग)
मान लो क़यामत आती नहीं तब तो और भी बुरा हाल होगा.पिताजी बताते थे कि उनके बचपन में हर 10 वर्ष बाद महामारी फैलती थी.दो को जला कर आते थे तो तीन और जलाने/दफनाने को तैयार मिलते थे.दस वर्ष में बड़ी आबादी साफ़ हो जाती थी. हैजा,चेचक,टाईफाईड,पीलिया,प्लेग का इलाज ना होने से भरी संख्या में लोग मारे जाते थे.
फिर फ़्रांसिसी सूक्ष्म जीव विज्ञानी डॉ.लुइ पास्चर और अंग्रेज डॉ. अलेक्सांद्र फ्लेमिंग की पेनिसिलिन व दूसरी एंटीबायोटिक  की खोजों ने अचानक मृत्यु दर घटा दी.सर्जरी ने भी मृत्यु दर घटाने में योगदान दिया.तब हर व्यक्ति 10 -12 बच्चे पैदा करता था फिर भी कई परिवारों में दीया-बत्ती करने वाला कोई न बचता था.आम तौर पर 1 -2 ही बचते थे.
जमीन के अन्दर खदानों में लोहा,ताम्बा,जिस्ट,अल्युमिनियम,टाइटेनियम,सोना,चांदी,हीरे,पेट्रोलियम,कोयला ज्यादा नहीं बचे हैं.80 % बिजली कोयले से बनती है.कोयले की कमी है.कूओं के अंदर CNG का दबाव कम हो रहा है.पहाड़ों पर बर्फ कम पड़ रही है.ग्लेशियर पिघल रहे हैं,डैम सूखे का सामना नहीं कर पाते.पनबिजली जरुरत के अनुसार बढ़ नहीं सकती.2010 में पृथ्वी ग्रह 700 करोड़ की आबादी से त्राहिमाम कर रहा था.2020 में 1000 करोड़ को कैसे झेल पायेगा?
मान लो डॉ. नारमन बोरलाग जिसने 1963 में ज्यादा उपज वाला मैक्सिकन गेहूं का बीज बनाया था,उसका नया भाई आ जाये तो भी हम कुछ नहीं कर पाएंगे.ज्यादा तरल नाइट्रोजन के लिए बिजली कहाँ से लायेंगे ? पोटाश,फास्फोरस,गंधक ज्यादा कहाँ से लायेंगे? कीड़ेमार व खरपतवार नाशक क्लोरो,फ्लोरो,ब्रोमो के योगिक कहाँ से लायेंगे ? 1950 में पानी 10 फुट था आज 200 फुट है कल 300 फुट नीचे होगा.इसे निकालने को बिजली कहाँ से लायेंगे?
(पुरानी दिल्ली)
कीमतों का अंदाज़ा लगायें.1947 में गेहूं रुपये का चार सेर,सब्जी 10-15 पैसे सेर,लकड़ी जलावन 15 पैसे सेर,दाल 3 पैसे  सेर,मिटटी का तेल 4 रु. लीटर, पेट्रोल 3 रु. लीटर.1970 में दूध 1 रु. किलो,घी 5 रु. किलो,सोना 180 रु. तोला,1956 में बिजली 4 आने यूनिट थी आज 6.5/रु. यूनिट.1965 में शाहदरा दिल्ली में जमीन 8 आने गज आज 1.25 लाख रु. गज और शाहदरा सी.बी.डी. 3.5 रु.लाख गज.तब पंजाबी बाग़ 8 रु. गज आज 7 लाख रु. गज,सुन्दर नगर 7 लाख रु. गज,चाणक्य पूरी 20 लाख रु. गज कनाट प्लेस घरेलु 18 लाख रु. गज,व्यापारिक 30 लाख रु. गज.आज दूध 26 रु. किलो,घी 400 रु. किलो,उड़द घोटू 85 रु. किलो,असली हींग 10 हज़ार रु. किलो है.
1835 में भारत में सबसे ज्यादा तनख्वाह महाराजा रणजीत सिंह के फौजी की 5 रु. प्रतिमास थी.महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद उनके राज्य पर कब्जा करने के बाद महाराजा गुलाब सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी की संधि के बाद सारा जम्मू कश्मीर,गिलगित,हुजा,चित्राल और लद्दाख सिर्फ 70 लाख रु. में कम्पनी ने महाराजा गुलाब सिंह को बेच दिया था.आज जम्मू या श्रीनगर में कई इमारतें 100-100 करोड़ की हो चुकी हैं.10-20 करोड़ वाली इमारतों का तो हिसाब ही नहीं.
गरीब व निम्न वर्ग दिन में कई बार मरता है.वह कहता है कि कल कि क़यामत आज आ जाये.हर बड़ा आदमी,पैसे और साधन वाला आदमी कभी भी क़यामत नहीं चाहेगा.पर होगा वही जो मंजूरे ख़ुदा होगा.


-----विद्या भूषन जैन.

For all my readers


Tuesday, February 01, 2011

जब भी लौट के तुम आओगे

एकांत मिला जब भी पल भर का,
उतर आए तुम ही आँखों में.
कागज़ ऊपर फैल गए तुम,
श्याम रूप धर कर स्याही का.


देखा जब जिस और भी मैंने,
मुझे घूरते पाया तुमको.
रहा भागता तुमसे हरदम,
मन से निकल नहीं पाए तुम.


अब भी दिल को समझाता हूँ,
कभी तो मुझको अपनाओगे.
जब भी लौट के तुम आओगे,
वहीँ खड़ा मुझको पाओगे.

V.B. Series

Monday, January 31, 2011


-------------ठाकुर गोपाल शरण सिंह

मेरा एक दोस्त है दोस्तों.

मेरा एक दोस्त है दोस्तों.
मैं उसका नाम तो नहीं लिखूंगा मगर प्लीज़ आप समझ जाना के वो कौन है .
वो बहुत ही खूबसूरत है,जैसे मेरे कान्हा जी,
बहुत समझदार है,जैसे सभी होते हैं,
बहुत अच्छा है,जैसे मैं खुद हूँ
और उसका दिल....................दिल तो जैसे संगमरमर का बना है.
सफ़ेद,पवित्र और पत्थर.
उसकी आत्मा जैसे ओस की बूँद जैसी है,निर्दोष,निर्मल और ठंडी.
मुझे वो बहुत पसंद है क्योंकि मैं  उससे प्यार करता हूँ.
उसको मैं पसंद नहीं क्योंकि मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ.
उसको मैं पहले पसंद था क्योंकि उसे ये पता नहीं था के मैं उसको कितना प्यार करता हूँ,
मगर जैसे-जैसे उसे पता लगा के मैं उसे कितना चाहता हूँ वैसे-वैसे वो मुझसे दूर होता गया.
वैसे उसकी कोई गलती हो ऐसा मैं नहीं मानता क्योंकि मैं ही उसे हमेशा जताता रहता था के मैं उससे कितना प्यार करता हूँ.
उसने कभी नहीं बताया के वो भी मुझसे प्यार करता है के नहीं.
मुझे कुछ समझता भी है के नहीं.
वो हमेशा मेरी कमजोरियां मुझे गिनाता रहा,मेरी गलतियाँ मुझे बताता रहा,मेरी मानसिकता में दोष ढूंढता रहा.
इस सबमें उसे ये तो कभी दिखा ही नहीं के मैं आखिर उससे प्यार भी तो बहुत करता हूँ.
अब प्यार करने के नाते कभी मैंने कुछ शरारत कर दी तो मेरी मानसिकता ख़राब,मैंने कुछ कह दिया तो मेरी मानसिकता गलत,

Friday, January 21, 2011

कह तो देता तुमसे मगर.........

कह तो देता तुमसे मगर.........
के तुम्हारी ख़ामोशी परेशान करती है,
तुम्हारी बेरुखी सताती है.
न बोलना तुम्हारा दुःख पहुंचता है.
कह तो देता तुमसे मगर.............

तुमसे दूर रहना अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारा मुझसे वो बेसाख्ता लिपटना याद आता है.
हवा में घुली तुम्हारी खुशबु मुझे सांस नही लेने देती.
कह तो देता तुमसे मगर.........

जी में आता है बहुत बार के भूल जाऊं सब कुछ,
न कुछ बोलू न कुछ सुनु.
लिपट जाऊं तुमसे और मूँद लूँ  आँखें.
मुझे मिल जाए माफ़ी....
कह तो देता तुमसे मगर.........

अब भी शाम होते ही मैं तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ,
तुम्हे देख कर सीने मैं अब भी कुछ चुभता है.
तुम्हारी मोहक मुस्कान दिल में अब भी सुलगती है...
कह तो देता तुमसे मगर.........


उन सवालों का जवाब नहीं मिला अब तक,
खामोश रह कर जो तुम किया करते थे.
नहीं सहन होता अब तुम्हारा ये गूंगा शोर....
नहीं देखा जाता खुद को आईने में..
कह तो देता तुमसे मगर.....

तुम तो भूल भी गये होगे मेरे प्यार को
मैं कैसे समेटूं अपना बिखरापन..
मेरे अँधेरे वीराने में चमकती है,
तुम्हारे दूधिया दांतों की सफेदी..
कह तो देता तुमसे मगर...

सपनों से डर के सोता नहीं मैं,
अपनों के डर से रोता नहीं मैं,
जमाने से डरता हूँ,
मगर तुम पे मरता हूँ..
कह तो देता तुमसे मगर.


V.B. Series

Wednesday, January 19, 2011

तुम क्यूँ न हुए मेरे ........

तुम बिन जीना मुहाल,
तुम बिन मरना भी मुश्किल.
आँखों की उदासी सब कह दे,
जो न कह पाया ये दिल.
दिल ने तो सब कह डाला था,
पर तुम ही समझ नहीं पाए.
वो लफ्ज़ नहीं तुम सुन पाए,
जो लफ्ज़ जुबां तक न आए.
क्या करूँ शिकायत अब तुमसे,
जब फर्क नहीं पड़ने वाला.
कोरी पुस्तक के लिक्खे को,
है कौन यहाँ पढने वाला.
भीगी आँखें जो पढ़ न सका,
वो कहा सुना क्या समझेगा.
बस अपने मन की कह देगा,
बस अपने मन की कर लेगा.
कुछ नहीं पूछना है तुमसे ,
उपकार बहुत मुझ पर तेरे,
बस इतना मुझको बतला दो....
तुम क्यूँ न हुए मेरे...
तुम क्यूँ न हुए मेरे .........

V.B. Series.

मैंने देखा है

*कभी देखा है तुमने ?
दर्द को कम होते !
किसी की पीड़ा को मिटते !
कैसे भूल जाता है कोई नासूर बने  दर्द को पलभर में.
कैसे मिल जाता है अवकाश किसी को बरसों की पीड़ा से !
मैंने देखा है खुद ही में ये सब
तुम्हारी मोहक हंसी जब गूंजती है कानों में,
जाने कहाँ चला जाता है दर्द,
जाने कहाँ भाग जाती है पीड़ा.
तुम्हारे दूधिया दांतों की चमक के नीचे
मैंने पीड़ा को पिसते देखा है.
तुम्हारी खनकदार हंसी को सुनकर
मैंने दर्द सिकुड़ते देखा है.*


V.B. Series.

Saturday, January 08, 2011

तुमको चाहना हम से और नहीं होगा....

तुमको चाहना हम से और नहीं होगा,
जलते रहना हम से और नहीं होगा.

तेरे बिन रहना तो अब भी मुश्किल है,
रोयेंगे पर ज़रा भी शोर नहीं होगा.

तुम जो कह दो तो मैं चाँद तोड़ लाऊं,
पर मेरा तुम पे उतना ज़ोर नहीं होगा.

छोड़ के दुनिया तुमको आज बता देंगे,
चाहने वाला हम-सा और नहीं होगा.

कोई तुम से कह दे, हम नहीं मानेंगे,
जलना बुझना बस अब और नहीं होगा.

तेरी नफरत अगर नहीं घट पायी तो,
प्यार हमारा भी कमज़ोर नहीं होगा.

पता चलेगा तुमको तब तन्हाई का,
विक्की जैसा जब कोई और नहीं होगा.





V.B. Series

Thursday, December 16, 2010

इस बार गिरेगी धुंध..........

इस बार गिरेगी धुंध,
तो मैं तुम्हें ख़त लिखूंगा.
तुम मेरे देश चले आना.
मैं तुम्हारी पसंद के रंग,
आसमान से चुरा कर,
रख लूँगा सहेज कर.
जब भी तुम आओगे,
मैं उन्हें तुम्हें सौंप दूंगा.
धुंध,कोहरा,कुहासा,
सफ़ेद भूरा चांदनी सा.
जब उतरेगा ज़मीन पर,
तुमको ढूंढूंगा  उसमे टटोल कर.
तब क्या तुम छू दोगे मुझे ?
शायद नही.
और यूँ अकेला खड़ा रहूँगा मैं.
धुंध में,कोहरे में,कुहासे में.
तब तुम मेरे एहसासों को समेट  लेना
और देना एक वायदा बस,
कि तुम सालों साल...
आते रहोगे हर धुंध के
गुलाबी मौसम  में.
और मैं हर साल,
लिखता रहूँगा तुम्हे ख़त,
इसी तरह............

V.B. Series

Sunday, December 12, 2010

भूलना उसको मुश्किल था पर...............

थी राह कठिन उस तक वापस  जाने की,
हो गयी इन्तिहाँ खुद को बहलाने की.
दिन को न चैन था रातों को न सो पाता था,
जो वक़्त मिला तो खुद को समझाता रहता था.
कभी न समझा उस बिन अब में जी सकता हूँ,
कच्चे धागे से टूटा दर्पण सी सकता हूँ.
अब खुली आँख तो देखा वो तो कहीं नहीं है,
खुशियों से लेकिन राह अभी तक भरी पड़ी है.
जो नहीं भाग में हो उसका फिर क्या रोना है,
रो-रो के तो बस मिले हुए को ही खोना है.
गुनगुनी धूप सा जीवन अब तक बहुत पड़ा है,
खोल के बाहें जीवन अब भी वहीँ खड़ा है.
गर कर पाया तो जीवन सोने सा कर लूँगा,
जो ख्वाब अधूरे थे उनको पूरा कर लूँगा.
इक नयी सुबह अलसाई मुझको ताक रही है,
काली रात अमावास सरपट भाग रही है.
हँसते मुस्काते रहने का अब सोच लिया है,
रूठा रूठा चेहरा अब पीछे छूट गया है.
हो गयी है आदत उससे इतना दूर रहा हूँ,
भूलना उसको मुश्किल था पर..................
भूल रहा हूँ.


V.B. Series.

कैसे बताऊँ तुम्हें?...............


मेरे प्यार की गहराई बढती जाती है लगातार
इसी के साथ पवित्र होती जाती हैं मेरी भावनाएं.
पल-दर-पल,समय-दर-समय,
जिंदगी आसान  सी होती जाती है
और मैं ये कह सकता हूँ कि
तुम्हारे लिए मेरा प्यार बढ़ता ही जाता है.

हमने संजोये बहुत से सपने और
उन्हें सच कर दिखाया.
हर क़दम के साथ हमारी नजदीकियां बढती गयी
और आज मेरे दिल में तुम हो....बस तुम.

अगर वाकई मापना चाहते हो
मेरी सच्चाई !
तो देखो मेरी आंखों में,
जो देंगी गवाही
और तुम वाकई जान जाओगे कि
मुझे तुमसे प्यार है.

मेरा प्यार तुम्हारे लिए नित नई आभा धरता है
हर सुबह नई आशा के साथ उगता सूरज
नये दिन के लिए नई आशा,
नई ख़ुशी लेकर आता है.
मेरे जीवन का वो नया सूरज तुम हो,
जो हर पल को नई खुशियों से भर देते हो.

मेरा प्यार तुम्हारे लिए भोर की अछूती किरण
की तरह पवित्र है और उसी की तरह सच्चा भी.
जैसे एक फूल की खुशबू,
ओह्ह ! कितने-कितने तरह से मैं तुम्हें चाहता हूँ........
कैसे बताऊँ तुम्हें?


V .B. Series.

Thursday, November 04, 2010

इस बार उजाला भीतर हो...........

मन द्वार सजा हो तोरण से
मन-आँगन सजे रंगोली से,
मन-मंदिर पावन ज्योति,
इस बार उजाला भीतर हो.

अंतस के गहन अँधेरे में,
धुंधली पड़ती पगडण्डी पर
बस एक नेह का दीप जले,
इस बार उजाला भीतर हो.

रिश्तों की उलझी परतों में,
उजली किरणों का डेरा हो,
हर मुख चमके निश्छल उज्जवल,
इस बार उजाला भीतर हो.

पिछली,बिखरी,उजड़ी,कडवी
बिसरें स्मृतियाँ जीवन की
अब नए स्वरों का गुंजन हो,
इस बार उजाला भीतर हो.

जीवन यात्रा के शीर्ष शिखर
आशीष भरे जिनके आँचल,
छाया दे हर नव अंकुर को,
इस बार उजाला भीतर हो.

प्रतिपल जीवन में उत्सव हो
हर दीप तेल और बाती का,
स्नेह पगा गठ बंधन हो,
इस बार उजाला भीतर हो.

साकार बने अब हर सपना,
अपनेपन का आकार बढे,
अब सब अपने ही अपने हो,
इस बार उजाला भीतर हो.



----प्रवीण उमेश मल्तारे
     भोपाल मध्यप्रदेश.

कौन आया?

अनमने मन की धरा पर,
मुस्कुराकर
दीप यह किसने जलाया
कौन आया?
खिलखिलाती धूप अगहन की कुंवारी
ज़िन्दगी के शुष्क  आँगन में उतारी
कौन बदली नीर यह बरसा गयी है
वादियों पर आ गयी फिर से खुमारी
रात के सूने पहर में
चांदनी सा
कौन आकर मुस्कुराया
कौन आया?
जम गया वातावरण में फिर हरापन
आ गया है द्वार अपने आप हरापन
प्यार के सन्देश देते हैं सितारे
कर दिया भटकी हवाओं ने समर्पण
सुप्त वीणा के हृदय में
चेतना का
तार किसने खन-खनाया
कौन आया?
वेदना के मिट गए बदल घनेरे
दिखते हैं स्वप्न में केवल सवेरे
फिर हुई आँखें शरारत पर उतारू
इन्द्रधनुषी हो गए अरमान मेरे
प्रण किया था
फिर न गाऊंगा कभी वह
गीत फिर से गुनगुनाया
कौन आया?


----मयंक श्रीवास्तव
    भोपाल मध्यप्रदेश