Thursday, June 28, 2018

गौमुख यात्रा, जून 2012

सोनू- अब यहां से आगे?
मैं- चलो पता करते हैं।
मैं -भाई साहब! गंगोत्री के लिए कहाँ से साधन मिलेगा?
भाई साहब- ऐसा कीजिये थोड़ा आगे टेक्सी स्टैंड है। वहां से जीप मिल जाएगी।
मैं- शुक्रिया जी।
मैं और साले साहब गौमुख जाते हुए उत्तरकाशी पहुंच चुके थे। 12 बजे का वक़्त हो चला था और हम आगे गंगोत्री का साधन ढूंढ रहे थे। ये बात जून 2012 की है। हम टैक्सी स्टैंड पहुंचे तो एक सूमो चलने को तैयार थी। बस दो सवारियों की कमी थी। मैंने देखा दोनों खिडकियों पर एक-एक सवारी थी। बीच में दो सीट खाली। मेरे लिए पहाड़ी सफर में खिड़की जरूरी। एक ओर साधु बाबा थे तो दूसरी ओर एक किशोर।
मैंने किशोर से कहा- भाई ये सीट मेको दे दे।
किशोर- क्यों? इस सीट के चक्कर में पहली गाड़ी निकाल चुका हूं।
मैं- भाई मुझे उल्टी लगेगी।
किशोर- तो अगली गाड़ी से आ जाइयो।
मैं- चल भई सोनू, बैठ इसी में। उल्टी आयी तो भाई की गोद में करूँगा। बाबा तो मोगरा दे मारेगा।
किशोर- (हंसते हुए) मोगरा क्या होता है भैया?
मैं- लट्ठ को हमारे यहां मोगरा भी कहते हैं। और बताओ, कहाँ जा रहे हो?
किशोर- जी मैं गंगोत्री जाऊंगा।
मैं- (मन में कुढ़ते हुए) ही ही ही। अच्छा। (मैंने तो सोचा था बीच में कहीं उतरोगे तो सीट हथिया लूंगा। लेकिन तू तो धुर तक छाती पर मूंग का हलवा बनाएगा।)
किशोर- कहाँ से आये हैं आप? गौमुख जाएंगे?
मैं- हरियाणा से आये हैं भाई। अभी तो गंगोत्री जाएंगे। आगे देखते हैं कहाँ ले जाते हैं रास्ते। नाम क्या है तुम्हारा?
किशोर- जी पंकज जोशी। और हमारा गंगोत्री में लॉज है।
मैं- अच्छा! फिर तो भैया तुम्हारे पास ही रुकेंगे हम तो। अब तो दोस्ती हो गयी अपनी! हैं हैं।
पंकज- जी भैया बिल्कुल। 2000 का रेट है, आप 1500 दे देना।
मैं- 1500 तो ज्यादा हैं यार।
पंकज- अरे भैया ज़्यादा नहीं हैं। सीजन चल रहा है इससे कम ना मिलेगा कहीं। आपको रूम भी ग्राउंड लेवल वाला दूंगा। कोई सीढ़ी वीढ़ी नहीं चढ़नी।
मैं- भई मैं 900 दे सकता हूँ बस।
पंकज- इतने में ना हो सकेगा भैया।
मैं- हुस्न पहाड़ों का ओ सायबां......
पंकज- आप तो बहुत मीठा गाते हो भैया।
मैं- तू फिर भी 1500 मांग रहा है।
पंकज- अरे आप 1200 दे देना। बस्स?
मैं- 900 से एक पैसा ज्यादा नहीं।
पंकज- इतने में तो ना होगा भैया।
मैं- सोनू मेरा फोन देना भाई।
पंकज- आपका फोन तो बड़ा प्यारा है भैया! दिखाना ज़रा।
मैंने फोन पंकज को पकड़ा दिया। उस समय एंड्रॉयड नहीं था चलन में। मेरे पास नोकिया 5233 था। कुछ देर देख कर पंकज ने फोन मुझे वापस कर दिया।
पंकज- भैया आप 1000 दे देना
मैं- 900 से एक पैसा ज्यादा नहीं।
पंकज- ये सभी हरियाणा वाले ऐसे ही होते हैं क्या?
मैं- कैसे?
पंकज- आप जैसे।
मैं- क्यों? मेरी क्या चीनियों जैसी शक्ल है?
पंकज-हा हा हा हा
चलिए आप 900 ही दीजिएगा। लेकिन किसी को बताइयेगा मत कि मैंने इतने में दिया है आपको।
चार घण्टे में हम गंगोत्री पहुंच गए। रास्ते में हम दोनों ने बहुत बातें की। पंकज बहुत बोलता था। मैं भी कम नहीं था। देखा जाए तो दोनों को एक ही कीड़े ने काटा था।
पंकज के लॉज में सामान रखकर हम उसके ऑफिस में आ गए। जहां हमने अपना नाम-पता लिखवाया और आई डी दी। पंकज ने बताया कि आप अभी जा के गौमुख जाने की परमिशन ले आइये। वरना सुबह दफ्तर देर से खुलेगा। खाना सामने वाले ढाबे में खाना। मैं उसको बोल के सस्ता और बढ़िया बनवा दूंगा। हम उसकी बात मान कर बाजार में आ गए।
मैं- सोनू! कहीं ये हमें ठग तो नहीं रहा! ज़रा कमरों के रेट पता कर लेते हैं।
सोनू- जी जीजू।
हमने वहां 5 लॉज और होटल्स में कमरों के रेट पता किये। शाम का समय होने के कारण कोई भी 2000 से नीचे नहीं बोला। एक 1500 बोला लेकिन हरियाणा का नाम सुनकर कमरा देने से साफ मना कर दिया। फिर एक दलाल आया और बोला- साहब आप भले आदमी लगते हो। नीचे थोड़ा चलना तो पड़ेगा लेकिन आपको 1700 में फर्स्ट क्लास कमरा दिला दूंगा।
मैंने उसको ऐसी नज़र से देखा कि बेचारा सहम कर भाग गया। हमें तसल्ली हो गयी कि पंकज भला लड़का है। फिर हम वन विभाग के दफ्तर में गए और सम्बंधित प्रपत्र भरकर अगले दिन गौमुख जाने की परमिशन ले ली। प्रपत्र में घर का पता, फोन नम्बर के अलावा ये भी लिखा था कि हम अपनी मर्जी से आगे जा रहे हैं और किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने पर दिए गए नम्बरों पर सूचित करके घरवालों को खबर दी जा सकती है।
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हम इसके बाद गंगा आरती में शामिल हुए और फिर वापस पंकज के लॉज में आ गए। शाम का खाना खाने भी पंकज के बताए होटल में ही गए। उन्होंने हमें 75 रुपये में दोनों को बढ़िया दाल फ्राई और तवे की करारी रोटियां खिलाई। मैं ज़रा मोटी रोटी पसन्द करता हूँ सो मेरे कहने पर उन्होंने मेरी पसन्द की रोटियां मुझे बना कर दी। साथ में रायता और सलाद कॉम्प्लीमेंट्री। हम जितने दिन वहां रहे खाना, नाश्ता सब वहीं किया। हर बार 70 से 75 रुपए में दो लोग। बाजार में 100 रुपये में खिला रहे थे एक बन्दे को।
इससे पहले पंकज ने अपना एक नौकर हमें दिया जिसको दाणी बोलते हैं वहां लोकल भाषा में। वो एक किशोर बालक था। उसने शाम को हमें पूरी गंगोत्री में घुमाया। नारायण कुंड पर हमें दो लोग मिले हरियाणा के। एक करीब साढ़े छह फीट लम्बे थे। दूसरे सामान्य कद के। वो सुबह गौमुख जाने वाले थे। मैंने उनको परमिशन लेने बारे पूछा तो उन्होंने अनभिज्ञता दर्शाई। फिर मेरे कहने पर वो गए और परमिशन लेके आये। हमने आपस में नम्बर साझा किए और सवेरे इकट्ठे चलने पर सहमति बनाई।
दाणी हमें स्थानीय कॉफी वाले बाबा की गुफा में भी ले गया जो आगन्तुकों को निशुल्क कॉफी पिलाते हैं। दुर्भाग्य से जब हम गए कॉफी उपलब्ध न थी। खैर घूम-फिरकर हम कमरे पर आकर सोने की तैयारी में लग गए। फिर पंकज कमरे में आया और हमारे साथ गप्पें हांकने लगा। दाणी को बोलकर गर्म पानी की बाल्टी मंगवाई और हम पैर धोकर रजाई में घुस गए। ठंड इतनी ज्यादा हो गयी थी कि मेरा फोन निर्जीव हो गया। मैंने उसे अपने शरीर की गर्मी दी तो उसने आंखें खोली। मैंने घर फोन करके अपनी स्थिति और अगले प्लान बारे सूचित किया। पंकज मेरे फोन को देख रहा था कि मैंने कैसे उसे अपनी गर्मी देकर चालू किया।
उसने कहा- भैया आप अपना फोन बेचेंगे?
मैं- पंकज जिसे तू इसकी खूबी समझ रहा है वो दरअसल इसकी खराबी है। मैं तुम्हें धोखे में रखकर कैसे ये खराब फोन दे सकता हूँ भला?
फिर उसने बताया कि हरियाणवी लोग आप जैसे कम होते हैं। एक बार एक हरियाणा का आदमी पैसे दिए बिना कमरा छोड़कर भाग गया और उनकी रजाई भी ले गया। जिसे वो लोग बसस्टैंड से वापस लेके आये। मैं उसकी बात सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ। जब नींद आने लगी तो पंकज ने कहा वो नीचे के कमरे में सो रहा है। कोई काम हो तो मैं फोन कर लूं। फिर हम सो गए।
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सवेरे चार बजे हम पानी व मिरिंडा की बोतलें, घर की बनी मठरियां, एक गिलास, अंतःवस्त्र और तौलिया एक बैग में लेकर चल पड़े। थोड़ा चलते ही हमारे साथी हमें आगे खड़े मिल गए जो शाम को नारायण कुंड पर मिले थे। अपने राज्य के लोग जब मिलते हैं तो दूसरे राज्य में अपनापन सा महसूस होता है। हम चल दिये। थोड़ा चलते ही महसूस हुआ कि वो लोग सामान्य आदमी नहीं थे। लम्बे वाले तो गज़ब के थे। न बीच में कहीं बैठना, न कुछ खाना। बातें भी जरूरी होने पर ही करते। उनके साथी की बातों से मालूम हुआ कि वो जलसेना या वायुसेना से सेवानिवृत्त हुए हैं। अविवाहित हैं और बहुत संयमी हैं। हमसे उनके बराबर नहीं चला जा रहा था। वो आगे निकल जाते तो हमारा इंतज़ार करते। लेकिन खड़े रहकर ही। हम उनके पास पहुँचते तो वो फिर चल देते। मार्ग में वो एक बार भी नहीं बैठे कहीं। मैंने उनको यति नाम दे दिया। 20 किलोमीटर के करीब ऊबड़-खाबड़ मार्ग, तेजी से कम होती ऑक्सीजन, तापमान में निरन्तर उतार-चढ़ाव, रास्ता नज़र न आना आदि कितनी ही मुश्किलें आईं। बीच में बड़ा विशाल मैदान भी आया जहां से हर ओर का नज़ारा इतना हसीन दिखता था कि इंसान सब थकान, परेशानियां भूल जाए। मैं वहां एक बड़े से सपाट पत्थर पर पीठ के बल लेट गया। आंखें बंद कर ली। 5 मिनट बाद धीरे से आंखें खोली तो इतना शानदार अनुभव हुआ कि उसके लिए मेरे शब्दकोश में कुछ दिन मिलता। बादलों को देखते हुए पहाड़ को निहारना। उफ्फ्फ कैसे न कोई दीवाना हो जाये। वहां से गौमुख थोड़ी दूर रह गया था। सो मैंने उन मित्रों को आगे चलने को कहा और अपने लाये हुए खाद्य में कुछ वज़न घटाने की सोची। बीच में भी हम खाते रहे थे। जिसमें यति के साथी तो खा लेते थे लेकिन यति जी केवल पानी पीते। वो दोनों अब आगे बढ़ गए और हम दोनों वहां पत्थरों पर बैठ कर बिस्कुट और मठरी खाने लगे। साथ में मिरिंडा की चुस्कियां। तभी हमारे पास पीले पंजों और पीली चोंच वाली कोयल के रंगों आकार की चिड़िया आ बैठी। मैंने उनको बिस्किट दिए। फिर वो हमारे बहुत करीब आ गईं। मैंने अपने हाथ पर बिस्कुट रखकर उनके सामने किया तो वो सभी मेरे हाथ, कंधे, सर और पैरों पर बैठ कर बिस्कुट खाने लगीं। मैंने सोनू की सहायता से वीडियो भी बनाई।
यहां तक का रास्ता कितना मुश्किल, खतरनाक और शरीर के कस-बल ढीले करने वाला था ये आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि मैंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि हे गंगे मैया! इस बार किसी तरह पार लगा दे, दोबारा नाम नहीं लूंगा आने का। मार्ग में नुकीले पत्थर जूतों के अंदर तक असर कर रहे थे। बीच में  सौ मीटर मार्ग इतना खतरनाक था कि मैंने सोनू को कहा तुम अभी यहीं रुको, अगर मैं सकुशल उस ओर पहुंच जाता हूँ तो आगे कदम बढ़ा लेना। वरना सहायता मंगा लेना। कुछ स्थानों पर रास्ते के नाम पर पेड़ काट कर पहाड़ी नाले पर पुल बना रखा था तो कहीं पर पहाड़ से निकले उभारों को पकड़ कर चलना पड़ा। एक जगह खिसकने वाला बारीक बजरी/बजरपुर था जिस पर चलते-चलते कई मीटर नीचे चले जाते। दौड़ कर पार न किया जाता तो खाई में जाना तय था।
बीच में सपाट और चौड़ा मार्ग आता लेकिन वहां तापमान इतना कम होता और हवा इतनी सर्द कि राम-राम करके वहां से निकलते। कई स्थान इतने खूबसूरत भी आये कि वहां हमने अपनी हार भी उतारी। बादल घिर करके जल्दी ही मन में भय भी जगा देते थे।
फिर हम आगे चल दिये। एक बजते-बजते हम गौमुख पहुंच गए। सारे रास्ते हम चारों के अलावा कोई नज़र नहीं आया था। वहां भी हमारे वो दोनों मित्र ( यति जी ), दो चार विदेशी नशेड़ी और इतने ही साधु महाराज के अलावा विशाल ग्लेशियर और निपट सन्नाटा पसरा हुआ था। यहां एक बात जरूर लिखूंगा कि ये सन्नाटा आप अधिक देर सहन नहीं कर सकते। कानों में अजीब जी शून्यता अनुभव होती है। निम्न वायुदाब और कम तापमान भी भ्रम और भय बढ़ाते हैं। जब हम गौमुख को दूर से देख रहे थे तो मुझे मटमैले से पहाड़ अजीब लग रहे थे। जब नजदीक पहुंचे तो पता लगा वो पहाड़ नहीं बल्कि ग्लेशियर था। जीवन में पहली बार ग्लेशियर देखा था मैंने। मैं भावुक सा हो रहा था। तब तक यति जी ने वापसी का बिगुल फूंक दिया।
मैंने सोनू से कहा मोटे! इन राकससां गेल आपणी कोनी खटावै, भजा-भजा आपणा मोर बणा देंगे।
सो मैंने उनसे कहा कि आप लोग चलो हम आ जाएंगे।
इससे पहले भोजवासा आने से पहले हम इतना थक गए थे कि सोनू कहने लगा जीजू हम भोजवासा रुक जाते हैं। मैंने कहा कि अगर भोजवासा जाएंगे तो काफी नीचे उतरना पड़ेगा। फिर वापसी में उतना ही चढ़ना भी होगा। हम ऐसा करेंगे कि आते वक्त भोजवासा रुक जाएंगे। सुबह वापस गंगोत्री।

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सो अब गौमुख पहुंच कर इतना जल्दी हम वापस जाने के मूड में तो कतई नहीं थे। गौमुख में ऐसी निस्तब्धता थी कि सामान्य गृहस्थ वहां ज्यादा देर नहीं रुक सकता। खैर हम थकान से बिल्कुल टूट चुके थे। मैंने सोनू से कहा मैं तो नाऊँगा। (नहाऊंगा)
सोनू मेरी ओर दीदे फाड़ के देखने लगा कि कहीं जीजू पर विपरीत माहौल ने कुछ गलत असर तो नहीं कर दिया जो पागलों वाली बात कर रहे हैं। एक तो हिमांक के नजदीक तापमान, दूसरे हवा की सायं-सायं। ऊपर से बर्फ के नीचे से आता हड्डियां गलाने वाला पानी। सोनू ने साफ मना कर दिया। मैंने उसे समझाया कि यहां स्नान करना बहुत पुण्य का काम है। लेकिन उसने साफ इंकार कर दिया। मैंने कहा ठीक है। पहले मैं नहा लेता हूँ। फिर देखते हैं। मैंने झटपट कपड़े उतारे और सोनू को पास में खड़ा करके उसका हाथ पकड़ पानी में पैर डाला। पानी ने बड़ी जोर से करंट मारा और करंट मेरे शरीर से होता हुआ सोनू को भी लगा। उसके हाथों से मेरा हाथ छूट गया और मैं धड़ाम से पानी में गिरा। पानी गहरा नहीं था लेकिन प्रवाह तेज़ था। इतनी देर में जो हिस्सा पानी में डूबा पहले गुलाबी फिर लाल और फिर हरा होते हुए नीला हो गया। ये सब कुछ ही पलों में हो गया था और तब तक सोनू सम्भल चुका था। उसने तुरंत मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बाहर खींच लिया।
तब तक आसपास के लोग भी आ गए थे और मुझे काफी कुछ कहा भी सबने। लेकिन मेरी स्थिति अभी लकवाग्रस्त आदमी जैसी थी। सुन सब रहा था, समझ कुछ नहीं आ रहा था। कुछ महसूस भी नहीं हो रहा था। धीरे-धीरे शरीर नीले से हरा, लाल और गुलाबी होता हुआ सामान्य हुआ। मुझे कुछ हालात समझ आये और मैंने जल्दी से कपड़े पहन लिए।
अब जब मैंने सोनू की तरफ देखा तो वो रोने लग गया।
मैंने कहा चाहे रो चाहे झीक। नहाणा तो पड़ैगा बेट्टे। तन्नै मेरा आथ क्यूँ छोड्या था।
जब वो ज्यादा रोने गया तो मैंने कहा ठीक सै, तू पाणी मैं मत ना उतरै, गिलास गेल बाहर बेठ कै नै नाह ले। उसने बेचारे ने मेरे डर से दो-चार गिलास पानी अपने ऊपर डाले तो फिर बोला अब चाहे आप मुझे नदी में ही फेंक दो, लेकिन मैं और पानी नहीं डाल सकता। फिर मैंने जबरदस्ती दो गिलास उस पर डाले तो वो उठकर भाग लिया और दूर जाकर कपड़े पहन लिए।
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डेढ़ बज चुके थे। हमने अब चलने की सोची तो मेरी नज़र एक साधु पर पड़ी। बहुत विराट व्यक्तित्व, चेहरे पर अनोखा तेज़, कपड़े भगवा और बिल्कुल स्वच्छ। दाढ़ी सफेद और लम्बी। कद करीब 7 फीट, शरीर हृष्ट पुष्ट। वो आंखें बंद करके कुछ जाप कर रहे थे। उनको देखते ही मेरे मन में श्रद्धा जागृत हो गयी। मैंने सोनू से कहा कि उन महात्मा से आशीष लेकर जाने का मन कर रहा है। सोनू के सहमति पाकर हम उनके सामने जाकर बैठ गए। मन में श्रद्धा के साथ भय भी था कहीं अकारण क्रुद्ध न हो जाएं।
बीस मिनट के बाद उन्होंने आंखें खोली। मेरी नज़रों में नज़र डालते ही कहा- कितना समय हो गया शादी को?
मैं (हतप्रभ होकर)- छह वर्ष हो रहे हैं प्रभु इसी माह 21 को।
महात्मा- गंगोत्री में चीड़वासा से पहले किसी से भी पूछ कर फौजी बाबा के आश्रम में पहुंच जाना कल। मैं आज भोजवासा रुकूँगा। कल शाम तक आ जाऊंगा। उन्हीं के आश्रम में इन दिनों निवास करता हूँ। वहीं कुछ दवा दूंगा। भगवान ने चाहा तो अगले साल पुत्र प्राप्त करोगे।
मैं चरणवन्दन करके भाव विभोर होता हुआ गंगोत्री के लिए वापस चलने को उद्यत हुआ। 2 बजे हम चल दिये। नहाने के कारण या साधु महाराज के दर्शनों के कारण हमारा शरीर बिल्कुल स्वस्थ और चुस्त अनुभव कर रहा था। साधु बाबा का यूँ बिना बताए मेरा मन पढ़ लेना हमें चमत्कार लगा। मेरी शादी के छह साल बाद तक निसंतानता का दंश मुझे सताए देता था। महात्मा ने एक शब्द बोले बिना सीधे शब्दों में अगले दिन दवाई लेने हेतु आदेश करना मुझे हैरान कर गया। फिर तो हमारे पैरों को पंख लग गए। बीच में एक स्थान पर हमें समझ नहीं आ रहा था किधर जाएं। कोई दूर तक नज़र भी नहीं आ रहा था। हम काफी समय मूर्खों की भांति खड़े रहे। मैं कहता इधर जाना है तो सोनू कहता इधर से तो हम आये हैं जीजू। बड़ा मुश्किल समय था। तब मैंने कहा कि मैं सामने की ऊंची चट्टान पर चढ़ कर बताता हूँ अगर कुछ समझ आता है। फिर मैं एक चट्टान पर चढ़ गया। वहां से मुझे एक ओर भोजवासा नज़र आया तो मैंने सोनू से कहा हमें उधर जाना है। फिर मैं नीचे उतर आया। जब हम चलने लगे तो सोनू बोला जीजू उधर नही, आपने इधर कहा था।
मैं- तू बोतड़ू है के?
सोनू- जीजू सच में हमें उधर जाना है।
मैं- ओ बावली बूच, नुनै तै तो हम आये हाँ।
सोनू- अब आपको कैसे समझाऊं जीजू।
मैं- ठीक है, इस बार मैं ऊपर से जिधर जाने को बोलूं उधर इन पत्थरों से तीर का निशान बना देना।
फिर हमने काफी सारे पत्थर इकट्ठा करे और मैं दोबारा से चट्टान पर चढ़ गया। चट्टान पर आने-जाने में जो मेरा दम फूला मैं ही जानता हूँ। इस कारण मुझे गुस्सा भी बहुत आ रहा था। खैर मैंने ऊपर से उसे इशारा किया और एक बड़ा सा तीर उसने ज़मीन पर बना दिया। मैं नीचे आया तो देखा उसने फिर से तीर उल्टा बना रखा था। मैं ऊपर आ-जा कर परेशान हो चुका था। मैं उस पर गुस्सा हुआ।
सोनू- जीजू आपको भ्रम हो रओ है। मैं ऐसा क्यों करूँगो भला। मन्नै के यहीं मरणो है।? मैं तो ये पकड़ा कान। थारी गेल कभी ना जाऊंगो कहीं।
मैं- ठीक सै, ना मरिये मेरे गेल। फेर ईब नू बता कित जावां?
सोनू- कहीं ना जाणो, अठे ई तपस्या कर लांगा।
मेरा गुस्सा अब कम हो रहा था। मैंने सोचा कि सोनू ऐसा क्यों करेगा भला। जरूर ये वातावरण का असर है जो मुझे भ्रम भी हो रहा है और गुस्सा भी ज्यादा आ रहा है। फिर मैंने सोनू को मनाया और हम तीर के निशान को सही मान कर चल पड़े।  हम अंधेरा होने से पहले 7 बजे गंगोत्री पहुंच गए। गंगोत्री पहुंचते-पहुंचते थक कर निढाल हो गए थे। पंकज हमें उसी दिन वापस आया देख बोला कि हम आधे रास्ते से वापस आये हैं। तब मैंने उसे अपने फोटो और वीडियो दिखाए तो हैरान रह गया। बोला कि एक ही दिन में गौमुख आना और जाना हर किसी के बस की बात नहीं। मैंने उसे बताया कि हम पर यक्षों और यतियों का आशीष हो गया था। पंकज कान खुजाता रहा कि ऐसा क्या मिल गया था हमें जो हम एक ही दिन में गौमुख जाकर लौट आये।
उसे हैरान परेशान छोड़ हम खाना खाने चले गए। 75 रुपये में छककर खाना खाया और वापस आकर 8 बजते-बजते ऐसे चित्त हुए कि पंकज बतियाने के लिए देर तक दरवाज़ा पीट कर चला गया मगर हमें होश न आया।
*********

अचानक रात एक बजे किसी ने मेरा कमरा खटखटाया। मैंने उनींदे में दरवाज़ा खोला तो बाहर एक सरदार जी खड़े थे।
सरदार जी- प्रा जी मैं हुणे घर जाना पै गया। कमरे दे पैहे लओ ते मैं चल्लण।
मैं कुछ देर तक तो कुछ समझा नहीं। फिर याद आया कि पंकज का ऑफिस मेरे दरवाजे से लगता ही था। सरदार जी मुझे लॉज का मालिक समझ रहे थे। मैंने सरदार जी को बैठाया और पंकज का फोन लगाया। पंकज ने फोन उठाया नहीं। फिर मैं नीचे उसके कमरे में गया। उसने बड़ी मुश्किल से आंखें खोली और मैंने बताया कि कोई सरदार जाने की कह रहा है। उससे कितने पैसे लेने हैं। पंकज बोला सरदार जी ने तीन दिन के लिए कमरा ले रखा है। वो कहीं नहीं जाने वाले। आप जा कर सो जाओ। फिर वो पलट कर खर्राटे लेने लगा।
मुझे गुस्सा तो बहुत आया। एक तो इतनी ठंड, ऊपर से आधी रात का समय। उस पर कोई किसी की बात भी न सुने।
मैं गुस्से में कमरे में आया और सरदार जी को बोला कि उसने कहा है आपने तीन दिन के लिए कमरा लिया है। सो तीन दिन के पैसे देने पड़ेंगे।
सरदार जी- अजी तुस्सी फड़ो छेत्ती 1600 से हिसाब नाळ 4800 रुपये ते साड्डा खाड़ा छड्डो।
सरदार जी मेरी हथेली पर 4800 रुपए रखकर कमरा खाली कर परिवार समेत निकल गए। मैं रुपये लेकर सो गया।
खट खट
खट खट
मैं- कौन है यार इतनी सवेरे?
पंकज- मैं हूँ भाई जी। आपको सवेरे जल्दी नहीं जाना क्या? और वो सरदार जी रात बिना पैसे दिए भाग गए।
मैं- तो मैं तेरे पास गया तो था। तू ही नहीं उठा बिस्तर से। और हमने एक और दिन रुकने का सोचा है।
पंकज- लेकिन उन्होंने तो तीन दिन रुकना था ना। खैर अब तो नुकसान हो गया 1600 का।
मैं- ले पकड़ 4800 रुपए। तीन दिन के। मैंने उनसे ले लिए थे। और इतना आलसी होना भी सही नहीं। तभी लोग तेरी रजाई लेके भागते होंगे।
पंकज- 4800 रुपए! (हैरानी से) लेकिन भैया 1600 ही लेने थे।
मैं- तो बता देता फिर। मैं वहां खड़ा ठिठुरता रहा, तू खर्राटे लेने लगा।

पंकज को 4800 रुपये देकर हम नहा धोकर तैयार हो घूमने निकल गए। दोपहर का खाना खाकर हम फौजी बाबा के आश्रम को चल दिये। 12 बजे हम वहां पहुंच गए। वहां एक लड़का झाड़ू लगा रहा था। एक कुटिया में फौजी बाबा बैठे थे। हम उस लड़के से बतियाने लगे। बाबा थोड़ी देर में गर्म चाय लेकर हमारे पास आये और कड़क पंजाबी आवाज़ में हमसे चाय लेने को कहा। हमने सहमते हुए चाय ले ली। ठंड होने लगी थी सो आश्रम की धूप बहुत अच्छी लग रही थी।
फौजी बाबा- किससे मिलना है?
मैं- गौमुख में एक बाबा ने आपके आश्रम में मिलने के लिए कहा था।
फौजी बाबा- कौन वो बिलासपुरिया? क्या काम है उससे? वो ठग क्या देगा तुम्हें? (कड़क आवाज़ में)
मैं- (मिमियाते हुए) जी वो कोई दवाई देंगे, निःसन्तानता की।
बाबा- हुंह वो साला क्या देगा। ठग। भाग जाओ यहां से। अब ना तो कहीं कस्तूरी मिलेगी। ना भालू की नाभि। ऐसे में वो इतनी महंगी दवा तुम्हें मुफ्त में क्यों देगा! भालू की नाभि लाने वालों को सरकार आजकल जेल में डाल देती है। भाग जाओ।
मैं एक ओर जाकर बैठ गया। धूप ढलने लगी थी। हम धूप के साथ ही सरक रहे थे। फौजी बाबा केवल एक गर्म इनर ही पहने हुए थे। 
मैं- बाबा आपको ठंड नहीं लगती?
बाबा- तुम्हें भी नहीं लगेगी। 100 गलगल का रस निकाल कर लोहे की कढ़ाई में पकाओ। जब दही जितना गाढ़ा हो जाये तो थोड़ा देशी घी डाल दो। फिर खोए जितना गाढ़ा करके कांच के बर्तन में निकाल लो। एक उंगली सर्दियों में चाट लो जब ठंड लगे। फिर मेरी तरह नंगे रहना सर्दियों में। बच्चे को बच्चे की उंगली जितना चटाओ। बड़े को बड़े की उंगली जितना।
मैं- वो बाबा तो आये नहीं। आप ही दवा बता दो न बाबा।
फौजी बाबा- भाग जाओ यहां से।
तभी सामने से वही महात्मा आते हुए नज़र आये। उन्होंने हमें देखकर कहा कि देरी के लिए शर्मिंदा हैं। फिर झट से हमें अपनी कुटिया में ले गए जहां एक कोने में दीपक जल रहा था। कुछ चित्र रखे थे देवों के। बाबा ने दो तीन अलग-अलग डब्बों से कुछ दवाइयां मिलाई। सब मिलाकर सात पुड़ियाँ बनाईं और बछड़े वाली गाय के दूध के साथ लेने की हिदायत दी। अपना मोबाइल नम्बर देकर कहा कि कोई समस्या हो तो फोन कर लें। हमने कुछ देना चाहा तो स्नेह सहित मना कर दिया।
हम फौजी बाबा से आशीष लेकर चल दिये। बाबा ने कहा कि साल भर के बाद निःसन्तान न रहोगे। (अर्जुन अगले साल 15 अगस्त 2013 को पैदा हो भी गया।)
हम वहां से जल्दी से चल दिये और अंधेरा होते-होते उसी होटल पर खाना खाकर कमरे पर आकर सो गए। सवेरे जल्दी निकलना था सो पंकज को रात में ही 900 प्रतिदिन के हिसाब से 2700 रुपये दे दिए। उसने मना करते हुए कहा कि हम उसको पहले ही 3200 रुपए दे चुके हैं। और वो नहीं लेगा। मैंने फिर जबरन उसे 1000 रुपए दे दिए। इसने 100 रुपए दाणी को और 100 मुझे लौटा दिए। इस प्रकार हम कुल 900 में तीन दिन गंगोत्री में रुके और काफी अच्छे सम्बन्ध वहां बनाये। लेकिन समय बीतने के दौरान अब सम्पर्क नहीं रहा पंकज से। फेसबुक पर मित्र हैं लेकिन उसकी आईडी ऑपरेट नहीं हो रही लम्बे समय से।


-निम्बल

अब कुछ चित्र-
गौमुख पर बाबा जी के साथ

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

हीरोगिरी

मार्ग में लकड़ी का पुल

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

परिंदों को बिस्कुट खिलाते हुए।

Wednesday, December 06, 2017

तारादेवी यात्रा

तारा देवी यात्रा (सितम्बर 2013)

भारत दर्शन व्हाट्सअप समूह के प्रमुख श्री संतोष मिश्रा जी के मार्गदर्शन में मैं अपना पहला यात्रा वृतांत लिख रहा हूँ। ज़ाहिर है अनुभव न होने पर कुछ गलतियां भी होंगी जिनमें तकनीकी और भाषाई गलतियां सम्भव हैं।
फिर भी प्रयास कर रहा हूँ।

23 सितम्बर 2013 को पिल्लूखेड़ा-पानीपत-कालका-तारादेवी सारा रास्ता ट्रेन द्वारा तय किया गया। वैसे बस द्वारा भी आराम से पहुंचा जा सकता है दिल्ली, पानीपत या चंडीगढ़ से। निकटतम एयरपोर्ट शिमला।
देखने लायक स्थानों में तारादेवी मन्दिर, भारत स्काउट एंड गाइड कैम्प, जंगल, शिमला, जाखू मन्दिर, तारादेवी मन्दिर से तारादेवी स्टेशन आते समय कठिन रास्ते पर प्राचीन और दुर्गम शिव मंदिर आदि गिने जा सकते हैं।

तारादेवी यात्रा -1

मुझे पता चला कि मेरे स्कूल को ‘कब एंड बुलबुल’ प्रशिक्षण के लिए 23 सितम्बर 2013 से 26 सितम्बर 2013 तक बच्चों को तारा देवी(शिमला) ले जाने के लिए चुना गया है। मैं स्कूल इंचार्ज था और मेरी जिम्मेदारी थी कि बच्चों को लेके जाऊं और सुरक्षित घर भी लेके आऊँ।
मैंने पांचवीं कक्षा से 5 बच्चे सिलेक्ट किये और उनको आवश्यक सामग्री के अलावा घरवालों से अनुमति लेने को कह दिया। ‘कब एंड बुलबुल’ स्काउटिंग का ही रूप है जिसमें प्राइमरी स्तर के बच्चों को प्रशिक्षित किया जाता है। 23 सितम्बर को सवेरे पिल्लूखेड़ा से 5 बजे हम ट्रेन में बैठे और 7 बजे से पहले पानीपत पहुंच गए । पानीपत से कालका 7.40 पर हिमालयन क्वीन ट्रेन से हम चल पड़े। ।
चलने से पहले कुछ आवश्यक सामान की लिस्ट हमें दी गयी थी जिसमें ड्रेस से लेकर टॉर्च, सुई, रस्सी, धागा, चद्दर आदि काफी सामान था। बच्चे रास्ते के लिए खाना भी ले आये थे। पानीपत से ट्रेन करीब पौने आठ बजे रवाना हुई और सवा ग्यारह बजे हम कालका स्टेशन पर उतरे। हमारे साथ दूसरे टीचर और बच्चे भी थे जिनमें से कुछ पहले भी तारा देवी आ चुके थे।
कालका से शिमला भी हिमालयन क्वीन नामक ट्रेन (टॉय ट्रेन) 12.10 पर चलनी थी जिसमें बला की भीड़ होती है। सो हमें पहले ही समझा दिया गया था कि पानीपत वाली ट्रेन से उतरते ही हमें भाग कर आगे खड़ी टॉय ट्रेन में सीटें हथिया लेनी हैं वरना करीब 6 घण्टे खड़े होकर जाना पड़ेगा। इसलिए हमने तय प्लान के अनुसार ट्रेन से उतरते ही मिल्खा सिंह को याद किया और सबसे पहले ट्रेन के पूरे डिब्बे को कब्ज़ा लिया। जिसमें काफी सारे बच्चे और टीचर एडजस्ट हो गए थे। दो साथी जाकर सबकी टिकट ले आये।
ट्रेन 12 बजकर 10 मिनट पर चली। थोड़ा चलते ही बाहर कुदरत के बिछाए हरे भरे दृश्य मन को मोहने लगे। बच्चे बहुत प्रसन्न थे। रास्ता सुंदर से सुंदरतम होता जा रहा था। चूंकि बरसात अभी लौटी ही थी सो हरियाली अपने यौवन पर थी।  ट्रेन की गति अधिक नहीं थी और ज़रा-ज़रा सी देर में अगला स्टेशन आ जाता। टकसाल, गुम्मन, कोटि, सोनवारा, धर्मपुर, कुमारहट्टी और बड़ोग स्टेशन तक ट्रेन लगातार चलती रही। बड़ोग में इस ट्रैक की सबसे बड़ी सुरंग आती है। पूरे रास्ते में इतनी सुरंगें आती हैं कि गिनना मुश्किल है। फिर भी कालका स्टेशन पर इस सबका पूरा वर्णन और इतिहास लिखा हुआ है एक बड़े से पत्थर के पट्ट पर।
बड़ोग में ट्रेन कुछ अतिरिक्त समय तक रुकी। वहां पर खाने-पीने के लिए दुकानें हैं जहां से चाय, मट्ठी, बिस्कुट, क्रीम रोल, पकौड़े आदि लेकर हमने बच्चों को खिलाए। पिछले स्टेशन्स पर भी दुकानें थी लेकिन बड़ोग स्टेशन थोड़ा ज्यादा बड़ा स्टेशन है जहाँ पर ट्रेन भी क्रॉस होती हैं। चाय-नाश्ता करने के बाद ट्रेन फिर से चल पड़ी। अगला स्टेशन सोलन था। आगे सलोगड़ा,कंडाघाट, कनोह, कथीलघाट, शोघी।
शोघी से अगला स्टेशन तारादेवी है। स्टेशन से तुरंत पहले स्काउट हाल्ट है जहाँ गाड़ी रुकवाने के लिए शोघी स्टेशन से स्पेशल परमिशन लेनी पड़ती है। स्काउट हाल्ट और तारादेवी स्टेशन के बीच छोटी सी सुरंग है। हमने पहले ही परमिशन ले ली थी क्योंकि यदि गाड़ी हाल्ट पर ना रुकवाई जाती तो हमें बच्चों समेत या तो ग़ैरकानूनी रूप से सुरंग से होकर हाल्ट आना पड़ता या फिर करीब दो किलोमीटर पहाड़ पर से घूम कर हमें हमारे कैंप में जाना पड़ता। सुरंग से होकर आना न केवल गैरकानूनी है बल्कि खतरनाक भी है। अंधेरा, कीचड़, फिसलन तो पटरियों पर है ही सबसे बड़ा खतरा किसी भी तरफ से अचानक ट्रेन या मोटर कार (पटरी वाली) के आने का रहता है। सो हम स्काउट हाल्ट पर करीब साढ़े चार बजे उतरे और बच्चों को लेकर कैम्प साइट की ओर चल दिये। रास्ता थोड़ा सम्भल कर चलने का है क्योंकि ट्रेन से उतरते ही सीधे पहाड़ पर ही चढ़ना होता है करीब 300 से 500 मीटर।


तारादेवी यात्रा-2 (भारत स्काउट्स एंड गाइड कैम्प)

हम अपने बैग उठा कर साइट पर पहुंचे जहां लकड़ियों से बना काफी बड़ा शयनकक्ष, मेस, कक्षा कक्ष, अन्य कार्यालय आदि बने हुए थे। स्टोर रूम, रसोई, परेड ग्राउंड, ऑफिशियल स्टाफ के लिए स्पेशल शयनकक्ष आदि के अलावा थोड़ा और ऊपर जाने पर भी अलग से ठहरने के लिए कोठरियां बनी हुई थीं। हमने सबसे पहले अपना रजिस्ट्रेशन कराया और फिर कम्बल, गद्दे और चद्दरें लेकर बड़े शयनकक्ष में अपना स्थान सुनिश्चित किया। शयनकक्ष में डबलस्टोरी बैड बने हुए थे। हमने बच्चों को ऊपर के बैड दे दिए और स्वयं नीचे वाले बैड पर अपना सामान रख लिया।
हमें पूरी कार्यवाही में सन्ध्या हो गयी थी बच्चों को वहां छोड़कर साथी अध्यापकों ने आसपास के इलाके का मुआयना करने का प्लान बनाया। (हमारा कैम्प 4 दिन का था जिसमें दो दिन आने और जाने के और 2 दिन की ट्रेनिंग थी। उसमें भी एक दिन शिमला घूमने के लिए दिया जाता था और आधा दिन ऊपर तारादेवी मन्दिर में जाने के लिए छूट थी।)
हम अंधेरा होने से पहले आसपास घूम कर आ गए थे। तारादेवी स्टेशन से होते हुए हम बस अड्डे और बाजार में घूम के आये। वास्तव में हमारी कैम्प साइट जंगलों में थी जहाँ से बस्ती करीब दो किलोमीटर दूर थी। शयनकक्ष में हर तीसरे बेड पर चार्जिंग पॉइंट दिया हुआ था और रोशनी का भी पर्याप्त प्रबन्ध था। शाम होते ही मैं बच्चों को मेस की ओर बाहर ले आया जहाँ से एक ओर तारादेवी कस्बे के बेहद खूबसूरत नजारा दिख रहा था और दूसरी ओर शिमला का बहुत आकर्षक रूप नज़र आ रहा था। हिमाचल में मुझे एक बात खासतौर पर अच्छी लगी कि वहां मैंने कभी बिजली जाते हुए नहीं देखी। सो जंगलों में बने हमारे कैम्प से दोनों ओर बिजली के बल्ब इतने खूबसूरत दिख रहे थे मानों ऊपर और नीचे आसमान ही बिछा हुआ था। दूर शिमला की ओर देखने तो ये ही पता नहीं लग पा रहा था कि धरती कहाँ तक है और आसमान कहाँ से शुरू हो रहा है।
बच्चों ने अलग अलग पोज़ बना कर फोटो खिंचवाए और आंखें फाड़-फाड़ कर मानों सारी खूबसूरती को अपने भीतर कहीं उतार लेना चाह रहे थे। घण्टे भर में ठंड ने बताया कि वहां सिर्फ रोशनी ही नहीं है बल्कि वो स्वयं (सर्दी) भी अपना साम्राज्य फैला रही है। बच्चे गर्म कपड़े पहने हुए थे, मैं भी अपनी चद्दर ओढ़े था। सबने डट कर खाना खाया और खाने के दौरान ही हमें रात को आयोजित होने वाले कैम्प फायर बारे सूचित कर दिया गया।
घण्टे भर में सभी कैम्प फायर के लिए निर्धारित बड़े से हॉल में इकट्ठे हो गए जहाँ सैकड़ों लोगों के बैठने की जगह थी, एक ओर स्टेज बनी थी जिस पर रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कुछ ही समय में कार्यक्रम शुरू हो गया जिसमें बहुत सारे टीचर्स ने गाने, कविता, चुटकुले और अन्य मनोरंजक गतिविधियों का आनन्द उठाया। करीब 12 बजे फायर ऑफ हुआ और हम निर्धारित स्थान पर आकर सो गए।
***

तारादेवी यात्रा-3 (मन्दिर दर्शन और रोमांचक ट्रैकिंग )

अगले दिन यानी 24 को मंगलवार था। मंगल को ऊपर पहाड़ी पर स्थित माता तारादेवी के मंदिर में विशेष भंडारा लगता है। इसलिए आधा दिन की ट्रेनिंग के बाद सबको तारादेवी जाने की अनुमति दे दी गयी। हमारे कैम्प से तारादेवी मन्दिर तक सारा रास्ता ट्रेकिंग का है। बच्चों ने पानी की बोतल, छतरी, कुछ खाने का सामान और बाकी अपने हौसले को लेकर 11 बजकर 30 पर ट्रैकिंग शुरू कर दी। रास्ता बच्चों के लिहाज से थोड़ा कठिन कहा जा सकता है लेकिन उनकी उमंग और न थकने की काबिलियत के आगे ये महसूस नहीं हुआ। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ने लगी मौसम में ठंडक और आर्द्रता बढ़ने लगी। हम जल्दी से मन्दिर पहुंच जाना चाहते थे। बीच में पेशाब वगैरा के लिए बच्चे रुके तो बादल दिखाई दिए जो पहाड़ों में अभी जन्म ही ले रहे थे। सूरज चमक रहा था और मौसम खुशगवार था। 1 बजे से पहले हम मन्दिर पहुंच गए थे। वहां कुछ देर धूप में बैठे। फिर माता के दर्शन करके भंडारे में बैठ गए। 5 से ज्यादा लोग अलग-अलग खाद्य सामग्री बाल्टियों में भरकर बाँट रहे थे। एक आदमी प्लेटें देकर गया। फिर चावल, मीठा रसेदार पता नहीं क्या था जो मिला तो थोड़ा सा लेकिन बहुत स्वादिष्ट था। छोले, कढ़ी, दाल और दो सब्जियां और थीं। रोटियां नर्म और गर्मा-गर्म थीं। हमने छककर भोजन किया और फिर बाहर आकर वापसी का प्लान बनाया। किसी ने बताया कि एक और रास्ता भी है नीचे जाने का जो छोटा है। लेकिन साथ ही उसने चेतावनी भी दी कि बच्चों के साथ जाने की भूल मत कीजियेगा। रास्ता बहुत खतरनाक, रोमांचक और बहुत अधिक ढलवां होने के बारे में हमें बताया गया तो हमने पहले वाले रास्ते से ही जाने को वरीयता दी। हम मन्दिर प्रांगण में थोड़ी फोटोग्राफी करके वापस चल दिये। सूरज भी अब वापसी की ट्रेन में बैठ चुका था। मौसम में ठंडक और बढ़ने लगी। बच्चे हाफ बाजू की शर्ट पहने थे और स्काउटिंग वाला बड़ा रुमाल ही उनके लिए चद्दर का काम कर रहा था लेकिन अपर्याप्त रूप से। लगभग आधे रास्ते के बाद बादल अधिक गहरे हो गए और दिखना भी कम हो गया। असल में बादल हमारे चारों ओर छा गए थे। अंधेरा तो नहीं हुआ था लेकिन सफेद बादल धुंध जैसा माहौल बना रहे थे। ऐसा नज़ारा न कभी हमने देखा था न बच्चों ने। जब चलना मुहाल होने लगा तो हम सब एक बड़ी सी सीमेंट की बनी छतरी के नीचे बैठ गए। समय करीब ढाई बजे का था लेकिन बादलों ने एकाएक अंधेरा कर दिया था। छतरी के नीचे न हवा से बचाव हो रहा था न बादलों से। हमने नोट किया कि हमारे कपड़े टपकने लगे थे। बादलों ने हमें तरबतर कर डाला था। बच्चे ठंड से कांपने लगे थे। और कोढ़ में खाज के रूप में बारिश भी शुरू हो गयी। हवा ठंडी, भीगी और तेज़ थी। सभी बच्चे आपस में चिपक कर और सिकुड़ कर बैठ गए। बारिश तेज़ हो गयी थी। भले ही ठंड लग रही थी लेकिन सबको मज़ा भी आ रहा था।
मैंने बच्चों की ठंड दूर करने का मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाया और सबको खयाली चाय बनाकर पिलाई। कैसे पहले आग जलाते हैं; पतीला चढ़ाते हैं; उसमें पानी, चीनी, चाय और दूध मिलाते हैं। और फिर गर्म चाय सुड़कते हुए पीते हैं। इतना सब करते-करते बारिश भी कम हो गयी और बच्चों को थोड़ा सहारा भी मिला भीतर से।
फिर हमने हनुमान चालीसा भी गाई जिसमें दो बच्चों ने पूरा और बाकी बच्चों ने यथासम्भव साथ दिया। चाय पीने और चालीसा गाने के बाद सबमें जोश आ गया और हल्की बूंदा बांदी में ही हम दोबारा से चल पड़े। हालांकि सबके पास छतरी थी लेकिन फिर भी सभी भीग तो गए ही थे।
जाते समय सूर्य चमक रहा था और बादल भी अंधेरे की बजाय सफेदी बढ़ा रहे थे लेकिन अब सूरज ढलान पर था और बादल कालापन लिए हुए थे। बीच में बारिश बढ़ भी जाती थी लेकिन हम सब इतने भीग चुके थे कि न तो छतरी का कोई लाभ हो रहा था ना भीगने का डर बाकी बचा था। मैंने बच्चों को आगे कर लिया था और मैं पीछे कैमरा और छतरी लिए उनका हौसला बढ़ाया चल रहा था। कहीं-कहीं पेड़ों के घने होने से अंधेरा अधिक महसूस होने लगता था। ढलान वाले रस्ते अब पानी से भरने भी लगे थे। बिजली, बादल, पानी और अंधेरा कुल मिलाकर डरावना और रहस्यमय वातावरण बना रहे थे। तभी हमें हमारे कैम्प के नजदीक आने के संकेत मिलने लगे। एक स्थान पर काफी सारे छप्पर नुमा ढांचे नज़र आये जिनके नीचे हम सब खड़े हो गए क्योंकि बारिश ने रौद्र रूप ले लिया था। ऐसे में पेशाब की हाज़त भी अधिक होने लगती है सो हम बारी-बारी से उससे भी निबट लिए।
कुछ देर बाद रोशनी बढ़ी तो पता चला अभी दिन ढलने में काफी समय बचा हुआ है। अंधेरा तो बादलों के कारण हुआ था। अब भारी बारिश बूँदा-बाँदी में बदल चुकी थी और हमारा कैम्प भी लगभग आ गया था। बच्चे उत्साह से कैम्प की ओर दौड़े और शयनागार में पहुंचकर जल्दी से अपने गीले कपड़े बदल डाले।
शाम को खाना खाकर जल्दी से बिस्तर में घुस गए हम। आज किसी का भी मन कैम्प फायर के लिए तैयार नहीं था।

तारादेवी यात्रा-4 (शिमला/ जाखू मन्दिर भ्रमण)

अगले दिन 25 को सवेरे कुछ ट्रेनिंग और नाश्ता करके हमें शिमला जाने की छूट थी। हमने बच्चों को तारा देवी स्टेशन से ट्रेन में बैठाया और जतोघ, समरहिल के बाद शिमला स्टेशन पर हम सब उतर गए। वहां से पैदल ही हम मॉल रोड और बाकी बाजार में घूमे। रिज पर फोटो सेशन किया और जल्दी ही जाखू मन्दिर के लिए चल दिये। जाखू मन्दिर ज्यादा दूर भले नहीं है लेकिन चढ़ाई एक-दम सीधी है। सीढ़ियां बहुत खड़ी हैं और सांस बहुत जल्दी फूल जाती है।
“कहा जाता है यहाँ संजीवनी बूटी लाते वक़्त हनुमान जी ने तपस्यारत यक्ष ऋषि को देखा था और परिचय जानने एवं संजीवनी का पता पूछने के लिए पर्वत पर उतरे थे उनके वेग से पर्वत आधा धरती में धंस गया था। आज भी उनके पदचिह्नों को संगमरमर रूप में सुरक्षित करके मन्दिर में रखा गया है। यहीं पर हनुमान जी की स्वयंभू मूर्ति भी है। एक बहुत ऊंची सीमेंट की मूर्ति भी बनाई गई है जो दूर-दूर तक दिखाई देती है।
स्काउट्स की ड्रेस में बच्चे और हम सब अनुशासित तरीके से कुछ ही देर में जाखू पहुंच गए। बंदरों का इतना बड़ा जमावड़ा मैंने और कहीं नहीं देखा।
बन्दर खाने पीने की चीजों पर एकदम से टूट पड़ते हैं सो हमने बच्चों को साफ बता दिया था कि कोई बच्चा खाने की कोई भी चीज़ अपने पास नहीं रखेगा। लेकिन कुछ ही देर में मैंने नोट किया कि बन्दर हमारे आसपास मंडरा रहे थे। मैंने बच्चों से सख्ती से पूछा तो एक बच्चे की जेब से बिस्किट्स निकले। जिनको तुरन्त उन बंदरों ने झपट लिया।
पास में ही एक बड़ा लड़का हीरो बनने के चक्कर में अपने हाथ में चने रखकर बंदरों को खिला रहा था। उसके साथी मोबाइल में उसकी वीडियो बना रहे थे। बंदरों ने झटपट चने खाकर पहले तो उस लड़के को घुरकी दिखाई और बाद बड़ी ज़ोर से उसको बांह पर काट खाया जिससे उसकी शर्ट फट गई और बाजू का मांस बाहर लटक गया। हमारे बच्चे ये सब देखकर सहम गए। हमने जल्दी से मन्दिर में मत्था टेका और वहां से खिसकने में भलाई समझी।
जाखू मन्दिर के पास ही बच्चों को एक दुकान में गरमा-गरम चाय और पकौड़े खिलाए। बच्चे खुश हो गए। वापस शिमला आकर हम शीघ्र स्टेशन के लिए चल पड़े जहां से तारादेवी के लिए ट्रेन थी। स्टेशन से पता चला कि इस वक़्त कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं थी। सो हम जल्दी से बस स्टैंड पहुंचे और वापस आते-आते शाम हो गयी थी। हम बच्चों को लेकर सीधे भोजन करने पहुंच गए।
भोजनोपरांत सब प्रतिदिन की तरह कैम्प फायर के लिए एकत्र हुए और वहाँ मैंने ‘छोड़ो कल की बातें’ गाना सुनाया जिसको पर्याप्त तालियां मिलीं। फिर सब सो गए। शरीर थके होने से बिस्तर पर पहुंचते ही सवेरा हुआ मिला।
*****

तारादेवी यात्रा–5 (वापसी)

26 को वापसी थी इसलिए सवेरे सबका नाश्ता पैक करके दे दिया गया और बच्चों को लेकर हम इस बार सुरंग के रास्ते तारादेवी स्टेशन पर पहुंच गए। ठंड लग रही थी। सबने टिकट ली और ट्रेन के आनेपर सब उसमें चढ़ लिए। 11.30 से चलकर 4 बजे कालका हम उतर गए जहां से पानीपत के लिए 5 बजे पानीपत के लिए एकता एक्सप्रेस में हम सवार हो गए। पानीपत पहुंचते-पहुंचते साढ़े आठ बज गए और जब तक हमारी गाड़ी रुकती पिल्लूखेड़ा जाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म से सरकने लगी थी। मैं बच्चों को लेकर ट्रेन के पीछे दौड़ा, गार्ड को मिन्नत भी की लेकिन ट्रेन नहीं रुकी और हम मायूस होकर स्टेशन से सड़क पर चल दिये वहां से काफी देर बाद एक निजी वाहन से हमें घर तक लिफ्ट मिली और रात 12 बजे के करीब हम घर पहुँच कर सो गए।
इस प्रकार मेरी पहली और रोमांचकारी तारादेवी/स्काउट ट्रेनिंग यात्रा सम्पन्न हुई।

-निम्बल

Wednesday, November 30, 2011

मेरा वो रसीला आम...

नर्सरी में था मैं.अभी नया-नया स्कूल जाने लगा था. नयी वर्दी,नया बस्ता,नया माहौल, यानि मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. बस एक बात सही नहीं लग रही थी कि जो भी करो मास्टरनी जी से पूछ के करो,हुंह!! खैर गर्मियों के दिन थे,आमों का मौसम. मैं आधी छुट्टी में पापा के पास दुकान पर ही आ जाता.हमारी मिठाई की दुकान हुआ करती थी.वहां से मेरा स्कूल कुछ गज दूर ही था.मैं खाना खाता और कुछ मीठा खाकर स्कूल दौड़ जाता.ऐसे ही एक दिन जब मैं वापस स्कूल जा रहा था तो पापा ने सीजन का तोहफा एक दशहरी आम(काफी बड़ा और रसीला) मुझे ले कर दिया और मैं उसे थोडा थोडा खाते हुए स्कूल चला गया.मैंने दूर से ही देखा के कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं खेल रहा था.
मैंने सोचा स्कूल की छुट्टी बंद हो गई है, मैं घबरा गया,मैं आम को लेकर उलझन में पड़ गया के उसका क्या करूं? उसे मैं इतनी जल्दी खा तो नहीं सकता था और स्कूल में ले जाते डर लगता था के कहीं टीचर जी से मार न पड़ जाए.मुझे आव और ताव दोनों ही देखने का वक़्त नहीं मिला. मैंने आम को हसरत भरी निगाह से देखा,आँखों से चूसा और...और  फैंक दिया नाली में................. मैं भाग कर स्कूल के अंदर गया तो देखा सभी बच्चे खेल रहे थे.
मैं सकते में आ गया, यानि मैंने बिना वजह के वो मीठा, रसीला आम नाली में फैंक दिया था? कितना बुद्धू था मैं.बिना आगा पीछा देखे आम को फैंक डाला.मैं दौड़ के बाहर नाली के पास आया,उसमे वो आम अभी आधा ही डूबा था.मगर धीरे-धीरे आम नीचे जा रहा था और मेरी आँखों से आंसू भी.
खैर बरसों बीत गये, अनेक गर्मियां आई और गयी,बहुत सारे आम मैंने खाए. दशहरी भी और सफेदा भी. मगर जो मिठास उस आम में थी वो न दोबारा किसी आम में मुझे मिली न मैं आज तक उसे भूल पाया हूँ. अब चाहे कोई मुझे कितने ही आम दे दे मगर उस आम को खोने का दर्द मुझसे नहीं भूला जाता.

Friday, September 30, 2011

कहाँ खो गयी,हंसी तुम्हारी?


कहाँ खो गयी
हंसी तुम्हारी,
कौन ले गया?


शशिमुख ऊपर
मैलापन सा
कौन दे गया?


कल तक
जब तुम
मुस्काते थे


मादकता
हर इक के मन में,
भर जाते थे.


दंत पंक्ति
जब तुम उज्ज्वल
दिखलाते थे.


अंतस तक के
घोर अँधेरे
मिट जाते थे.


सूनापन सा
कैसा मुख पर
अब छाया है.


रूखा सा
व्यवहार तुम्हारा
हो आया है.


लाली चेहरे वाली
आखिर
कौन ले गया.


नयन कुटी में
गहन उदासी
कौन दे गया.

Saturday, September 10, 2011

कब तक तड़पूं ?

कब तक तड़पूं ?
कितना तड़पूं ?
कोई बताये....
राह सुझाये....
कितना सह लूँ ?
कब तक बहलूँ ?
बहुत हो चुका...
बहुत खो चुका.
कहा कुछ नहीं
सहा बहुत है.
रहा कुछ नहीं
गया बहुत है.
कितना समेटूं?
कब तक सहेजूँ?
कोई सिखाये.....
मुझे बताये.

Monday, June 13, 2011

तेरी याद ने आना छोड़ दिया

तेरी याद ने आना छोड़ दिया,
बेवक्त सताना छोड़ दिया.
ऐसा तो नहीं के भूल गये,
बस लब तक लाना छोड़ दिया.
मुश्किल है तुम बिन जीना पर,
दुनिया को बताना छोड़ दिया.

V. B. Series

Friday, February 11, 2011

आइये प्रोमिस करें.

नीचे कुछ तस्वीरें हैं जिन्हें देख के शायद आप भगवान से शिकायतें करना छोड़ दें.
हो सकता है कुछ लोगो को मेरा ये प्रयास निरर्थक लगे या इन तस्वीरों से घिन आए.
मगर मेरा मन तो बहुत विचलित हो गया ये सब देख कर.आईये आज से हम कुछ
ऐसा करना शुरू कर दें जिनसे किसी ना किसी रूप में हम इन बेबसों और लाचारों की
मदद कर सकें.
इन्हें खाने में स्वाद की नहीं बल्कि खाने की जरुरत है
मेरी मौन श्रद्धांजलि
इनको फैशन से सरोकार नहीं.
कभी सोचा है के ये अपना जीवन कैसे बिताते हैं?
माँ
माँ
दो भूखे
क़यामत
शिकायत है इनको भगवान से
गरीबी
अभाव
बेबसी



इन्हें देखें और विचार करें कि हम भगवान से इस बात कि शिकायत करें कि नहीं कि आज आपको पित्ज़ा मजेदार नहीं लगा,आज आप गाड़ी तेज़ नही भगा पाए,आपको अपनी जींस पसंद नहीं,आपके बाल झड रहे हैं,ब्राड-बैंड की  स्पीड कम है...........आदि.

आज है प्रोमिस डे.
आइये प्रोमिस करें.

Monday, February 07, 2011

क्या संसार बचेगा?

(नास्त्रेदमस)
टी. वी. पर अक्सर चर्चा आती रहती है कि क्या संसार बचेगा? माया कैलंडर और नास्त्रेदमस के अनुसार 28 दिसम्बर 2012 को संसार नष्ट हो जायेगा.
माया लोग कोलंबस की 1482 में अमरीकी खोज तक भारत से 10 गुना बड़े एरिया पर हजारों बरसों तक राज करते रहे.उन्हें यूरोपीय गोरों ने जमीन व सोने के लालच में स्पेनी लुटेरे सेनापति पिजारो ने समाप्त कर दिया. उन्होंने खुद का विनाश 200 वर्ष पूर्व देख लिया था. फिर 1520 में फ्रांसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी सामने आई.पहले यूरोपीयन भारत को ओरिएंट कहते थे.उन्होंने लिखा है 1950 के बाद ओरिएंट (भारत) में एक शक्तिशाली महिला शासक आएगी.बाद में पतन का शिकार होगी.फिर विरोधियों की फूट से दोबारा सत्ता में आएगी.वह 67 वर्ष की आयु में अपने घर में अपने अंगरक्षकों द्वारा मारी जाएगी.तब सदी बदलने में 16 वर्ष  रह जायेंगे.
1520 में इंदिरा जी व उनके पूर्वजों पंडित जवाहर लाल नेहरु,मोती लाल नेहरु व गंगाधर का नामो निशान तक नहीं था.उसने हिटलर व उसके कारनामों को 400 वर्ष पूर्व ही लिख दिया था.नाम हिस्टर लिखा.फिर लिखा कि नये देश (अमेरिका) के न्यूयार्क शहर में दो धातु के पक्षी चौरस मीनार जैसे खम्बों जैसी इमारतों से टकरायेंगे और नष्ट कर देंगे.उत्तर का मंगोल देश (चीन) अति शक्तिशाली बन कर दूसरों का जीना हराम कर देगा.उसको ओरिएंट (भारत),नया देश (अमेरिका) व रूस मिलकर हराएंगे.संसार का भयानक विनाश होगा.क्या कोई 25 वर्ष पूर्व सोच सकता था कि चीन 25 वर्ष बाद अर्थात 2010 में संसार की दूसरी आर्थिक और तीसरी सैनिक शक्ति बन जायेगा?
इस्लाम का भी पक्का विश्वास क़यामत में है.उनके ग्रंथों में क़यामत का काफी ज़िक्र है.बाईबल की कहानियों में भी क़यामत का काफी वर्णन है.यह भी कहा गया है कि क़यामत आती जाती रहेगी.
आबादी अंधाधुंध बढ़ रही है.हर 22 वर्ष में डबल हो रही है.1947 में हम 20 करोड़ थे आज 135 करोड़ हैं.तब जिस जमीन पर 1 आदमी था आज 7 हैं और 2032  मे 14 होंगे.
पंजाब के महाबली महाराजा रणजीत सिंह का राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी से रोपड़ की संधि के बाद तय हुआ था.वर्तमान पकिस्तान का सिंध व बलूचिस्तान का कुछ भाग छोड़ कर सारा पकिस्तान जैसे सिंध,बलूचिस्तान,पंजाब,दर्रा खैबर तक सूबा सरहद,जम्मू-कश्मीर,गिलगित,हुजा,चित्राल,लद्दाख,भारतीय पंजाब के जिले अमृतसर,जालंधर,होशियारपुर.इनमे टोटल 69 लाख की आबादी थी.आज उसी एरिया में 16 करोड़ की आबादी है.
(प्लेग)
मान लो क़यामत आती नहीं तब तो और भी बुरा हाल होगा.पिताजी बताते थे कि उनके बचपन में हर 10 वर्ष बाद महामारी फैलती थी.दो को जला कर आते थे तो तीन और जलाने/दफनाने को तैयार मिलते थे.दस वर्ष में बड़ी आबादी साफ़ हो जाती थी. हैजा,चेचक,टाईफाईड,पीलिया,प्लेग का इलाज ना होने से भरी संख्या में लोग मारे जाते थे.
फिर फ़्रांसिसी सूक्ष्म जीव विज्ञानी डॉ.लुइ पास्चर और अंग्रेज डॉ. अलेक्सांद्र फ्लेमिंग की पेनिसिलिन व दूसरी एंटीबायोटिक  की खोजों ने अचानक मृत्यु दर घटा दी.सर्जरी ने भी मृत्यु दर घटाने में योगदान दिया.तब हर व्यक्ति 10 -12 बच्चे पैदा करता था फिर भी कई परिवारों में दीया-बत्ती करने वाला कोई न बचता था.आम तौर पर 1 -2 ही बचते थे.
जमीन के अन्दर खदानों में लोहा,ताम्बा,जिस्ट,अल्युमिनियम,टाइटेनियम,सोना,चांदी,हीरे,पेट्रोलियम,कोयला ज्यादा नहीं बचे हैं.80 % बिजली कोयले से बनती है.कोयले की कमी है.कूओं के अंदर CNG का दबाव कम हो रहा है.पहाड़ों पर बर्फ कम पड़ रही है.ग्लेशियर पिघल रहे हैं,डैम सूखे का सामना नहीं कर पाते.पनबिजली जरुरत के अनुसार बढ़ नहीं सकती.2010 में पृथ्वी ग्रह 700 करोड़ की आबादी से त्राहिमाम कर रहा था.2020 में 1000 करोड़ को कैसे झेल पायेगा?
मान लो डॉ. नारमन बोरलाग जिसने 1963 में ज्यादा उपज वाला मैक्सिकन गेहूं का बीज बनाया था,उसका नया भाई आ जाये तो भी हम कुछ नहीं कर पाएंगे.ज्यादा तरल नाइट्रोजन के लिए बिजली कहाँ से लायेंगे ? पोटाश,फास्फोरस,गंधक ज्यादा कहाँ से लायेंगे? कीड़ेमार व खरपतवार नाशक क्लोरो,फ्लोरो,ब्रोमो के योगिक कहाँ से लायेंगे ? 1950 में पानी 10 फुट था आज 200 फुट है कल 300 फुट नीचे होगा.इसे निकालने को बिजली कहाँ से लायेंगे?
(पुरानी दिल्ली)
कीमतों का अंदाज़ा लगायें.1947 में गेहूं रुपये का चार सेर,सब्जी 10-15 पैसे सेर,लकड़ी जलावन 15 पैसे सेर,दाल 3 पैसे  सेर,मिटटी का तेल 4 रु. लीटर, पेट्रोल 3 रु. लीटर.1970 में दूध 1 रु. किलो,घी 5 रु. किलो,सोना 180 रु. तोला,1956 में बिजली 4 आने यूनिट थी आज 6.5/रु. यूनिट.1965 में शाहदरा दिल्ली में जमीन 8 आने गज आज 1.25 लाख रु. गज और शाहदरा सी.बी.डी. 3.5 रु.लाख गज.तब पंजाबी बाग़ 8 रु. गज आज 7 लाख रु. गज,सुन्दर नगर 7 लाख रु. गज,चाणक्य पूरी 20 लाख रु. गज कनाट प्लेस घरेलु 18 लाख रु. गज,व्यापारिक 30 लाख रु. गज.आज दूध 26 रु. किलो,घी 400 रु. किलो,उड़द घोटू 85 रु. किलो,असली हींग 10 हज़ार रु. किलो है.
1835 में भारत में सबसे ज्यादा तनख्वाह महाराजा रणजीत सिंह के फौजी की 5 रु. प्रतिमास थी.महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद उनके राज्य पर कब्जा करने के बाद महाराजा गुलाब सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी की संधि के बाद सारा जम्मू कश्मीर,गिलगित,हुजा,चित्राल और लद्दाख सिर्फ 70 लाख रु. में कम्पनी ने महाराजा गुलाब सिंह को बेच दिया था.आज जम्मू या श्रीनगर में कई इमारतें 100-100 करोड़ की हो चुकी हैं.10-20 करोड़ वाली इमारतों का तो हिसाब ही नहीं.
गरीब व निम्न वर्ग दिन में कई बार मरता है.वह कहता है कि कल कि क़यामत आज आ जाये.हर बड़ा आदमी,पैसे और साधन वाला आदमी कभी भी क़यामत नहीं चाहेगा.पर होगा वही जो मंजूरे ख़ुदा होगा.


-----विद्या भूषन जैन.

For all my readers


Tuesday, February 01, 2011

जब भी लौट के तुम आओगे

एकांत मिला जब भी पल भर का,
उतर आए तुम ही आँखों में.
कागज़ ऊपर फैल गए तुम,
श्याम रूप धर कर स्याही का.


देखा जब जिस और भी मैंने,
मुझे घूरते पाया तुमको.
रहा भागता तुमसे हरदम,
मन से निकल नहीं पाए तुम.


अब भी दिल को समझाता हूँ,
कभी तो मुझको अपनाओगे.
जब भी लौट के तुम आओगे,
वहीँ खड़ा मुझको पाओगे.

V.B. Series

Monday, January 31, 2011


-------------ठाकुर गोपाल शरण सिंह

मेरा एक दोस्त है दोस्तों.

मेरा एक दोस्त है दोस्तों.
मैं उसका नाम तो नहीं लिखूंगा मगर प्लीज़ आप समझ जाना के वो कौन है .
वो बहुत ही खूबसूरत है,जैसे मेरे कान्हा जी,
बहुत समझदार है,जैसे सभी होते हैं,
बहुत अच्छा है,जैसे मैं खुद हूँ
और उसका दिल....................दिल तो जैसे संगमरमर का बना है.
सफ़ेद,पवित्र और पत्थर.
उसकी आत्मा जैसे ओस की बूँद जैसी है,निर्दोष,निर्मल और ठंडी.
मुझे वो बहुत पसंद है क्योंकि मैं  उससे प्यार करता हूँ.
उसको मैं पसंद नहीं क्योंकि मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ.
उसको मैं पहले पसंद था क्योंकि उसे ये पता नहीं था के मैं उसको कितना प्यार करता हूँ,
मगर जैसे-जैसे उसे पता लगा के मैं उसे कितना चाहता हूँ वैसे-वैसे वो मुझसे दूर होता गया.
वैसे उसकी कोई गलती हो ऐसा मैं नहीं मानता क्योंकि मैं ही उसे हमेशा जताता रहता था के मैं उससे कितना प्यार करता हूँ.
उसने कभी नहीं बताया के वो भी मुझसे प्यार करता है के नहीं.
मुझे कुछ समझता भी है के नहीं.
वो हमेशा मेरी कमजोरियां मुझे गिनाता रहा,मेरी गलतियाँ मुझे बताता रहा,मेरी मानसिकता में दोष ढूंढता रहा.
इस सबमें उसे ये तो कभी दिखा ही नहीं के मैं आखिर उससे प्यार भी तो बहुत करता हूँ.
अब प्यार करने के नाते कभी मैंने कुछ शरारत कर दी तो मेरी मानसिकता ख़राब,मैंने कुछ कह दिया तो मेरी मानसिकता गलत,

Friday, January 21, 2011

कह तो देता तुमसे मगर.........

कह तो देता तुमसे मगर.........
के तुम्हारी ख़ामोशी परेशान करती है,
तुम्हारी बेरुखी सताती है.
न बोलना तुम्हारा दुःख पहुंचता है.
कह तो देता तुमसे मगर.............

तुमसे दूर रहना अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारा मुझसे वो बेसाख्ता लिपटना याद आता है.
हवा में घुली तुम्हारी खुशबु मुझे सांस नही लेने देती.
कह तो देता तुमसे मगर.........

जी में आता है बहुत बार के भूल जाऊं सब कुछ,
न कुछ बोलू न कुछ सुनु.
लिपट जाऊं तुमसे और मूँद लूँ  आँखें.
मुझे मिल जाए माफ़ी....
कह तो देता तुमसे मगर.........

अब भी शाम होते ही मैं तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ,
तुम्हे देख कर सीने मैं अब भी कुछ चुभता है.
तुम्हारी मोहक मुस्कान दिल में अब भी सुलगती है...
कह तो देता तुमसे मगर.........


उन सवालों का जवाब नहीं मिला अब तक,
खामोश रह कर जो तुम किया करते थे.
नहीं सहन होता अब तुम्हारा ये गूंगा शोर....
नहीं देखा जाता खुद को आईने में..
कह तो देता तुमसे मगर.....

तुम तो भूल भी गये होगे मेरे प्यार को
मैं कैसे समेटूं अपना बिखरापन..
मेरे अँधेरे वीराने में चमकती है,
तुम्हारे दूधिया दांतों की सफेदी..
कह तो देता तुमसे मगर...

सपनों से डर के सोता नहीं मैं,
अपनों के डर से रोता नहीं मैं,
जमाने से डरता हूँ,
मगर तुम पे मरता हूँ..
कह तो देता तुमसे मगर.


V.B. Series

Wednesday, January 19, 2011

तुम क्यूँ न हुए मेरे ........

तुम बिन जीना मुहाल,
तुम बिन मरना भी मुश्किल.
आँखों की उदासी सब कह दे,
जो न कह पाया ये दिल.
दिल ने तो सब कह डाला था,
पर तुम ही समझ नहीं पाए.
वो लफ्ज़ नहीं तुम सुन पाए,
जो लफ्ज़ जुबां तक न आए.
क्या करूँ शिकायत अब तुमसे,
जब फर्क नहीं पड़ने वाला.
कोरी पुस्तक के लिक्खे को,
है कौन यहाँ पढने वाला.
भीगी आँखें जो पढ़ न सका,
वो कहा सुना क्या समझेगा.
बस अपने मन की कह देगा,
बस अपने मन की कर लेगा.
कुछ नहीं पूछना है तुमसे ,
उपकार बहुत मुझ पर तेरे,
बस इतना मुझको बतला दो....
तुम क्यूँ न हुए मेरे...
तुम क्यूँ न हुए मेरे .........

V.B. Series.

मैंने देखा है

*कभी देखा है तुमने ?
दर्द को कम होते !
किसी की पीड़ा को मिटते !
कैसे भूल जाता है कोई नासूर बने  दर्द को पलभर में.
कैसे मिल जाता है अवकाश किसी को बरसों की पीड़ा से !
मैंने देखा है खुद ही में ये सब
तुम्हारी मोहक हंसी जब गूंजती है कानों में,
जाने कहाँ चला जाता है दर्द,
जाने कहाँ भाग जाती है पीड़ा.
तुम्हारे दूधिया दांतों की चमक के नीचे
मैंने पीड़ा को पिसते देखा है.
तुम्हारी खनकदार हंसी को सुनकर
मैंने दर्द सिकुड़ते देखा है.*


V.B. Series.

Saturday, January 08, 2011

तुमको चाहना हम से और नहीं होगा....

तुमको चाहना हम से और नहीं होगा,
जलते रहना हम से और नहीं होगा.

तेरे बिन रहना तो अब भी मुश्किल है,
रोयेंगे पर ज़रा भी शोर नहीं होगा.

तुम जो कह दो तो मैं चाँद तोड़ लाऊं,
पर मेरा तुम पे उतना ज़ोर नहीं होगा.

छोड़ के दुनिया तुमको आज बता देंगे,
चाहने वाला हम-सा और नहीं होगा.

कोई तुम से कह दे, हम नहीं मानेंगे,
जलना बुझना बस अब और नहीं होगा.

तेरी नफरत अगर नहीं घट पायी तो,
प्यार हमारा भी कमज़ोर नहीं होगा.

पता चलेगा तुमको तब तन्हाई का,
विक्की जैसा जब कोई और नहीं होगा.





V.B. Series

Thursday, December 16, 2010

इस बार गिरेगी धुंध..........

इस बार गिरेगी धुंध,
तो मैं तुम्हें ख़त लिखूंगा.
तुम मेरे देश चले आना.
मैं तुम्हारी पसंद के रंग,
आसमान से चुरा कर,
रख लूँगा सहेज कर.
जब भी तुम आओगे,
मैं उन्हें तुम्हें सौंप दूंगा.
धुंध,कोहरा,कुहासा,
सफ़ेद भूरा चांदनी सा.
जब उतरेगा ज़मीन पर,
तुमको ढूंढूंगा  उसमे टटोल कर.
तब क्या तुम छू दोगे मुझे ?
शायद नही.
और यूँ अकेला खड़ा रहूँगा मैं.
धुंध में,कोहरे में,कुहासे में.
तब तुम मेरे एहसासों को समेट  लेना
और देना एक वायदा बस,
कि तुम सालों साल...
आते रहोगे हर धुंध के
गुलाबी मौसम  में.
और मैं हर साल,
लिखता रहूँगा तुम्हे ख़त,
इसी तरह............

V.B. Series

Sunday, December 12, 2010

भूलना उसको मुश्किल था पर...............

थी राह कठिन उस तक वापस  जाने की,
हो गयी इन्तिहाँ खुद को बहलाने की.
दिन को न चैन था रातों को न सो पाता था,
जो वक़्त मिला तो खुद को समझाता रहता था.
कभी न समझा उस बिन अब में जी सकता हूँ,
कच्चे धागे से टूटा दर्पण सी सकता हूँ.
अब खुली आँख तो देखा वो तो कहीं नहीं है,
खुशियों से लेकिन राह अभी तक भरी पड़ी है.
जो नहीं भाग में हो उसका फिर क्या रोना है,
रो-रो के तो बस मिले हुए को ही खोना है.
गुनगुनी धूप सा जीवन अब तक बहुत पड़ा है,
खोल के बाहें जीवन अब भी वहीँ खड़ा है.
गर कर पाया तो जीवन सोने सा कर लूँगा,
जो ख्वाब अधूरे थे उनको पूरा कर लूँगा.
इक नयी सुबह अलसाई मुझको ताक रही है,
काली रात अमावास सरपट भाग रही है.
हँसते मुस्काते रहने का अब सोच लिया है,
रूठा रूठा चेहरा अब पीछे छूट गया है.
हो गयी है आदत उससे इतना दूर रहा हूँ,
भूलना उसको मुश्किल था पर..................
भूल रहा हूँ.


V.B. Series.

कैसे बताऊँ तुम्हें?...............


मेरे प्यार की गहराई बढती जाती है लगातार
इसी के साथ पवित्र होती जाती हैं मेरी भावनाएं.
पल-दर-पल,समय-दर-समय,
जिंदगी आसान  सी होती जाती है
और मैं ये कह सकता हूँ कि
तुम्हारे लिए मेरा प्यार बढ़ता ही जाता है.

हमने संजोये बहुत से सपने और
उन्हें सच कर दिखाया.
हर क़दम के साथ हमारी नजदीकियां बढती गयी
और आज मेरे दिल में तुम हो....बस तुम.

अगर वाकई मापना चाहते हो
मेरी सच्चाई !
तो देखो मेरी आंखों में,
जो देंगी गवाही
और तुम वाकई जान जाओगे कि
मुझे तुमसे प्यार है.

मेरा प्यार तुम्हारे लिए नित नई आभा धरता है
हर सुबह नई आशा के साथ उगता सूरज
नये दिन के लिए नई आशा,
नई ख़ुशी लेकर आता है.
मेरे जीवन का वो नया सूरज तुम हो,
जो हर पल को नई खुशियों से भर देते हो.

मेरा प्यार तुम्हारे लिए भोर की अछूती किरण
की तरह पवित्र है और उसी की तरह सच्चा भी.
जैसे एक फूल की खुशबू,
ओह्ह ! कितने-कितने तरह से मैं तुम्हें चाहता हूँ........
कैसे बताऊँ तुम्हें?


V .B. Series.