Wednesday, December 06, 2017

तारादेवी यात्रा

तारा देवी यात्रा (सितम्बर 2013)

भारत दर्शन व्हाट्सअप समूह के प्रमुख श्री संतोष मिश्रा जी के मार्गदर्शन में मैं अपना पहला यात्रा वृतांत लिख रहा हूँ। ज़ाहिर है अनुभव न होने पर कुछ गलतियां भी होंगी जिनमें तकनीकी और भाषाई गलतियां सम्भव हैं।
फिर भी प्रयास कर रहा हूँ।

23 सितम्बर 2013 को पिल्लूखेड़ा-पानीपत-कालका-तारादेवी सारा रास्ता ट्रेन द्वारा तय किया गया। वैसे बस द्वारा भी आराम से पहुंचा जा सकता है दिल्ली, पानीपत या चंडीगढ़ से। निकटतम एयरपोर्ट शिमला।
देखने लायक स्थानों में तारादेवी मन्दिर, भारत स्काउट एंड गाइड कैम्प, जंगल, शिमला, जाखू मन्दिर, तारादेवी मन्दिर से तारादेवी स्टेशन आते समय कठिन रास्ते पर प्राचीन और दुर्गम शिव मंदिर आदि गिने जा सकते हैं।

तारादेवी यात्रा -1

मुझे पता चला कि मेरे स्कूल को ‘कब एंड बुलबुल’ प्रशिक्षण के लिए 23 सितम्बर 2013 से 26 सितम्बर 2013 तक बच्चों को तारा देवी(शिमला) ले जाने के लिए चुना गया है। मैं स्कूल इंचार्ज था और मेरी जिम्मेदारी थी कि बच्चों को लेके जाऊं और सुरक्षित घर भी लेके आऊँ।
मैंने पांचवीं कक्षा से 5 बच्चे सिलेक्ट किये और उनको आवश्यक सामग्री के अलावा घरवालों से अनुमति लेने को कह दिया। ‘कब एंड बुलबुल’ स्काउटिंग का ही रूप है जिसमें प्राइमरी स्तर के बच्चों को प्रशिक्षित किया जाता है। 23 सितम्बर को सवेरे पिल्लूखेड़ा से 5 बजे हम ट्रेन में बैठे और 7 बजे से पहले पानीपत पहुंच गए । पानीपत से कालका 7.40 पर हिमालयन क्वीन ट्रेन से हम चल पड़े। ।
चलने से पहले कुछ आवश्यक सामान की लिस्ट हमें दी गयी थी जिसमें ड्रेस से लेकर टॉर्च, सुई, रस्सी, धागा, चद्दर आदि काफी सामान था। बच्चे रास्ते के लिए खाना भी ले आये थे। पानीपत से ट्रेन करीब पौने आठ बजे रवाना हुई और सवा ग्यारह बजे हम कालका स्टेशन पर उतरे। हमारे साथ दूसरे टीचर और बच्चे भी थे जिनमें से कुछ पहले भी तारा देवी आ चुके थे।
कालका से शिमला भी हिमालयन क्वीन नामक ट्रेन (टॉय ट्रेन) 12.10 पर चलनी थी जिसमें बला की भीड़ होती है। सो हमें पहले ही समझा दिया गया था कि पानीपत वाली ट्रेन से उतरते ही हमें भाग कर आगे खड़ी टॉय ट्रेन में सीटें हथिया लेनी हैं वरना करीब 6 घण्टे खड़े होकर जाना पड़ेगा। इसलिए हमने तय प्लान के अनुसार ट्रेन से उतरते ही मिल्खा सिंह को याद किया और सबसे पहले ट्रेन के पूरे डिब्बे को कब्ज़ा लिया। जिसमें काफी सारे बच्चे और टीचर एडजस्ट हो गए थे। दो साथी जाकर सबकी टिकट ले आये।
ट्रेन 12 बजकर 10 मिनट पर चली। थोड़ा चलते ही बाहर कुदरत के बिछाए हरे भरे दृश्य मन को मोहने लगे। बच्चे बहुत प्रसन्न थे। रास्ता सुंदर से सुंदरतम होता जा रहा था। चूंकि बरसात अभी लौटी ही थी सो हरियाली अपने यौवन पर थी।  ट्रेन की गति अधिक नहीं थी और ज़रा-ज़रा सी देर में अगला स्टेशन आ जाता। टकसाल, गुम्मन, कोटि, सोनवारा, धर्मपुर, कुमारहट्टी और बड़ोग स्टेशन तक ट्रेन लगातार चलती रही। बड़ोग में इस ट्रैक की सबसे बड़ी सुरंग आती है। पूरे रास्ते में इतनी सुरंगें आती हैं कि गिनना मुश्किल है। फिर भी कालका स्टेशन पर इस सबका पूरा वर्णन और इतिहास लिखा हुआ है एक बड़े से पत्थर के पट्ट पर।
बड़ोग में ट्रेन कुछ अतिरिक्त समय तक रुकी। वहां पर खाने-पीने के लिए दुकानें हैं जहां से चाय, मट्ठी, बिस्कुट, क्रीम रोल, पकौड़े आदि लेकर हमने बच्चों को खिलाए। पिछले स्टेशन्स पर भी दुकानें थी लेकिन बड़ोग स्टेशन थोड़ा ज्यादा बड़ा स्टेशन है जहाँ पर ट्रेन भी क्रॉस होती हैं। चाय-नाश्ता करने के बाद ट्रेन फिर से चल पड़ी। अगला स्टेशन सोलन था। आगे सलोगड़ा,कंडाघाट, कनोह, कथीलघाट, शोघी।
शोघी से अगला स्टेशन तारादेवी है। स्टेशन से तुरंत पहले स्काउट हाल्ट है जहाँ गाड़ी रुकवाने के लिए शोघी स्टेशन से स्पेशल परमिशन लेनी पड़ती है। स्काउट हाल्ट और तारादेवी स्टेशन के बीच छोटी सी सुरंग है। हमने पहले ही परमिशन ले ली थी क्योंकि यदि गाड़ी हाल्ट पर ना रुकवाई जाती तो हमें बच्चों समेत या तो ग़ैरकानूनी रूप से सुरंग से होकर हाल्ट आना पड़ता या फिर करीब दो किलोमीटर पहाड़ पर से घूम कर हमें हमारे कैंप में जाना पड़ता। सुरंग से होकर आना न केवल गैरकानूनी है बल्कि खतरनाक भी है। अंधेरा, कीचड़, फिसलन तो पटरियों पर है ही सबसे बड़ा खतरा किसी भी तरफ से अचानक ट्रेन या मोटर कार (पटरी वाली) के आने का रहता है। सो हम स्काउट हाल्ट पर करीब साढ़े चार बजे उतरे और बच्चों को लेकर कैम्प साइट की ओर चल दिये। रास्ता थोड़ा सम्भल कर चलने का है क्योंकि ट्रेन से उतरते ही सीधे पहाड़ पर ही चढ़ना होता है करीब 300 से 500 मीटर।


तारादेवी यात्रा-2 (भारत स्काउट्स एंड गाइड कैम्प)

हम अपने बैग उठा कर साइट पर पहुंचे जहां लकड़ियों से बना काफी बड़ा शयनकक्ष, मेस, कक्षा कक्ष, अन्य कार्यालय आदि बने हुए थे। स्टोर रूम, रसोई, परेड ग्राउंड, ऑफिशियल स्टाफ के लिए स्पेशल शयनकक्ष आदि के अलावा थोड़ा और ऊपर जाने पर भी अलग से ठहरने के लिए कोठरियां बनी हुई थीं। हमने सबसे पहले अपना रजिस्ट्रेशन कराया और फिर कम्बल, गद्दे और चद्दरें लेकर बड़े शयनकक्ष में अपना स्थान सुनिश्चित किया। शयनकक्ष में डबलस्टोरी बैड बने हुए थे। हमने बच्चों को ऊपर के बैड दे दिए और स्वयं नीचे वाले बैड पर अपना सामान रख लिया।
हमें पूरी कार्यवाही में सन्ध्या हो गयी थी बच्चों को वहां छोड़कर साथी अध्यापकों ने आसपास के इलाके का मुआयना करने का प्लान बनाया। (हमारा कैम्प 4 दिन का था जिसमें दो दिन आने और जाने के और 2 दिन की ट्रेनिंग थी। उसमें भी एक दिन शिमला घूमने के लिए दिया जाता था और आधा दिन ऊपर तारादेवी मन्दिर में जाने के लिए छूट थी।)
हम अंधेरा होने से पहले आसपास घूम कर आ गए थे। तारादेवी स्टेशन से होते हुए हम बस अड्डे और बाजार में घूम के आये। वास्तव में हमारी कैम्प साइट जंगलों में थी जहाँ से बस्ती करीब दो किलोमीटर दूर थी। शयनकक्ष में हर तीसरे बेड पर चार्जिंग पॉइंट दिया हुआ था और रोशनी का भी पर्याप्त प्रबन्ध था। शाम होते ही मैं बच्चों को मेस की ओर बाहर ले आया जहाँ से एक ओर तारादेवी कस्बे के बेहद खूबसूरत नजारा दिख रहा था और दूसरी ओर शिमला का बहुत आकर्षक रूप नज़र आ रहा था। हिमाचल में मुझे एक बात खासतौर पर अच्छी लगी कि वहां मैंने कभी बिजली जाते हुए नहीं देखी। सो जंगलों में बने हमारे कैम्प से दोनों ओर बिजली के बल्ब इतने खूबसूरत दिख रहे थे मानों ऊपर और नीचे आसमान ही बिछा हुआ था। दूर शिमला की ओर देखने तो ये ही पता नहीं लग पा रहा था कि धरती कहाँ तक है और आसमान कहाँ से शुरू हो रहा है।
बच्चों ने अलग अलग पोज़ बना कर फोटो खिंचवाए और आंखें फाड़-फाड़ कर मानों सारी खूबसूरती को अपने भीतर कहीं उतार लेना चाह रहे थे। घण्टे भर में ठंड ने बताया कि वहां सिर्फ रोशनी ही नहीं है बल्कि वो स्वयं (सर्दी) भी अपना साम्राज्य फैला रही है। बच्चे गर्म कपड़े पहने हुए थे, मैं भी अपनी चद्दर ओढ़े था। सबने डट कर खाना खाया और खाने के दौरान ही हमें रात को आयोजित होने वाले कैम्प फायर बारे सूचित कर दिया गया।
घण्टे भर में सभी कैम्प फायर के लिए निर्धारित बड़े से हॉल में इकट्ठे हो गए जहाँ सैकड़ों लोगों के बैठने की जगह थी, एक ओर स्टेज बनी थी जिस पर रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कुछ ही समय में कार्यक्रम शुरू हो गया जिसमें बहुत सारे टीचर्स ने गाने, कविता, चुटकुले और अन्य मनोरंजक गतिविधियों का आनन्द उठाया। करीब 12 बजे फायर ऑफ हुआ और हम निर्धारित स्थान पर आकर सो गए।
***

तारादेवी यात्रा-3 (मन्दिर दर्शन और रोमांचक ट्रैकिंग )

अगले दिन यानी 24 को मंगलवार था। मंगल को ऊपर पहाड़ी पर स्थित माता तारादेवी के मंदिर में विशेष भंडारा लगता है। इसलिए आधा दिन की ट्रेनिंग के बाद सबको तारादेवी जाने की अनुमति दे दी गयी। हमारे कैम्प से तारादेवी मन्दिर तक सारा रास्ता ट्रेकिंग का है। बच्चों ने पानी की बोतल, छतरी, कुछ खाने का सामान और बाकी अपने हौसले को लेकर 11 बजकर 30 पर ट्रैकिंग शुरू कर दी। रास्ता बच्चों के लिहाज से थोड़ा कठिन कहा जा सकता है लेकिन उनकी उमंग और न थकने की काबिलियत के आगे ये महसूस नहीं हुआ। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ने लगी मौसम में ठंडक और आर्द्रता बढ़ने लगी। हम जल्दी से मन्दिर पहुंच जाना चाहते थे। बीच में पेशाब वगैरा के लिए बच्चे रुके तो बादल दिखाई दिए जो पहाड़ों में अभी जन्म ही ले रहे थे। सूरज चमक रहा था और मौसम खुशगवार था। 1 बजे से पहले हम मन्दिर पहुंच गए थे। वहां कुछ देर धूप में बैठे। फिर माता के दर्शन करके भंडारे में बैठ गए। 5 से ज्यादा लोग अलग-अलग खाद्य सामग्री बाल्टियों में भरकर बाँट रहे थे। एक आदमी प्लेटें देकर गया। फिर चावल, मीठा रसेदार पता नहीं क्या था जो मिला तो थोड़ा सा लेकिन बहुत स्वादिष्ट था। छोले, कढ़ी, दाल और दो सब्जियां और थीं। रोटियां नर्म और गर्मा-गर्म थीं। हमने छककर भोजन किया और फिर बाहर आकर वापसी का प्लान बनाया। किसी ने बताया कि एक और रास्ता भी है नीचे जाने का जो छोटा है। लेकिन साथ ही उसने चेतावनी भी दी कि बच्चों के साथ जाने की भूल मत कीजियेगा। रास्ता बहुत खतरनाक, रोमांचक और बहुत अधिक ढलवां होने के बारे में हमें बताया गया तो हमने पहले वाले रास्ते से ही जाने को वरीयता दी। हम मन्दिर प्रांगण में थोड़ी फोटोग्राफी करके वापस चल दिये। सूरज भी अब वापसी की ट्रेन में बैठ चुका था। मौसम में ठंडक और बढ़ने लगी। बच्चे हाफ बाजू की शर्ट पहने थे और स्काउटिंग वाला बड़ा रुमाल ही उनके लिए चद्दर का काम कर रहा था लेकिन अपर्याप्त रूप से। लगभग आधे रास्ते के बाद बादल अधिक गहरे हो गए और दिखना भी कम हो गया। असल में बादल हमारे चारों ओर छा गए थे। अंधेरा तो नहीं हुआ था लेकिन सफेद बादल धुंध जैसा माहौल बना रहे थे। ऐसा नज़ारा न कभी हमने देखा था न बच्चों ने। जब चलना मुहाल होने लगा तो हम सब एक बड़ी सी सीमेंट की बनी छतरी के नीचे बैठ गए। समय करीब ढाई बजे का था लेकिन बादलों ने एकाएक अंधेरा कर दिया था। छतरी के नीचे न हवा से बचाव हो रहा था न बादलों से। हमने नोट किया कि हमारे कपड़े टपकने लगे थे। बादलों ने हमें तरबतर कर डाला था। बच्चे ठंड से कांपने लगे थे। और कोढ़ में खाज के रूप में बारिश भी शुरू हो गयी। हवा ठंडी, भीगी और तेज़ थी। सभी बच्चे आपस में चिपक कर और सिकुड़ कर बैठ गए। बारिश तेज़ हो गयी थी। भले ही ठंड लग रही थी लेकिन सबको मज़ा भी आ रहा था।
मैंने बच्चों की ठंड दूर करने का मनोवैज्ञानिक तरीका अपनाया और सबको खयाली चाय बनाकर पिलाई। कैसे पहले आग जलाते हैं; पतीला चढ़ाते हैं; उसमें पानी, चीनी, चाय और दूध मिलाते हैं। और फिर गर्म चाय सुड़कते हुए पीते हैं। इतना सब करते-करते बारिश भी कम हो गयी और बच्चों को थोड़ा सहारा भी मिला भीतर से।
फिर हमने हनुमान चालीसा भी गाई जिसमें दो बच्चों ने पूरा और बाकी बच्चों ने यथासम्भव साथ दिया। चाय पीने और चालीसा गाने के बाद सबमें जोश आ गया और हल्की बूंदा बांदी में ही हम दोबारा से चल पड़े। हालांकि सबके पास छतरी थी लेकिन फिर भी सभी भीग तो गए ही थे।
जाते समय सूर्य चमक रहा था और बादल भी अंधेरे की बजाय सफेदी बढ़ा रहे थे लेकिन अब सूरज ढलान पर था और बादल कालापन लिए हुए थे। बीच में बारिश बढ़ भी जाती थी लेकिन हम सब इतने भीग चुके थे कि न तो छतरी का कोई लाभ हो रहा था ना भीगने का डर बाकी बचा था। मैंने बच्चों को आगे कर लिया था और मैं पीछे कैमरा और छतरी लिए उनका हौसला बढ़ाया चल रहा था। कहीं-कहीं पेड़ों के घने होने से अंधेरा अधिक महसूस होने लगता था। ढलान वाले रस्ते अब पानी से भरने भी लगे थे। बिजली, बादल, पानी और अंधेरा कुल मिलाकर डरावना और रहस्यमय वातावरण बना रहे थे। तभी हमें हमारे कैम्प के नजदीक आने के संकेत मिलने लगे। एक स्थान पर काफी सारे छप्पर नुमा ढांचे नज़र आये जिनके नीचे हम सब खड़े हो गए क्योंकि बारिश ने रौद्र रूप ले लिया था। ऐसे में पेशाब की हाज़त भी अधिक होने लगती है सो हम बारी-बारी से उससे भी निबट लिए।
कुछ देर बाद रोशनी बढ़ी तो पता चला अभी दिन ढलने में काफी समय बचा हुआ है। अंधेरा तो बादलों के कारण हुआ था। अब भारी बारिश बूँदा-बाँदी में बदल चुकी थी और हमारा कैम्प भी लगभग आ गया था। बच्चे उत्साह से कैम्प की ओर दौड़े और शयनागार में पहुंचकर जल्दी से अपने गीले कपड़े बदल डाले।
शाम को खाना खाकर जल्दी से बिस्तर में घुस गए हम। आज किसी का भी मन कैम्प फायर के लिए तैयार नहीं था।

तारादेवी यात्रा-4 (शिमला/ जाखू मन्दिर भ्रमण)

अगले दिन 25 को सवेरे कुछ ट्रेनिंग और नाश्ता करके हमें शिमला जाने की छूट थी। हमने बच्चों को तारा देवी स्टेशन से ट्रेन में बैठाया और जतोघ, समरहिल के बाद शिमला स्टेशन पर हम सब उतर गए। वहां से पैदल ही हम मॉल रोड और बाकी बाजार में घूमे। रिज पर फोटो सेशन किया और जल्दी ही जाखू मन्दिर के लिए चल दिये। जाखू मन्दिर ज्यादा दूर भले नहीं है लेकिन चढ़ाई एक-दम सीधी है। सीढ़ियां बहुत खड़ी हैं और सांस बहुत जल्दी फूल जाती है।
“कहा जाता है यहाँ संजीवनी बूटी लाते वक़्त हनुमान जी ने तपस्यारत यक्ष ऋषि को देखा था और परिचय जानने एवं संजीवनी का पता पूछने के लिए पर्वत पर उतरे थे उनके वेग से पर्वत आधा धरती में धंस गया था। आज भी उनके पदचिह्नों को संगमरमर रूप में सुरक्षित करके मन्दिर में रखा गया है। यहीं पर हनुमान जी की स्वयंभू मूर्ति भी है। एक बहुत ऊंची सीमेंट की मूर्ति भी बनाई गई है जो दूर-दूर तक दिखाई देती है।
स्काउट्स की ड्रेस में बच्चे और हम सब अनुशासित तरीके से कुछ ही देर में जाखू पहुंच गए। बंदरों का इतना बड़ा जमावड़ा मैंने और कहीं नहीं देखा।
बन्दर खाने पीने की चीजों पर एकदम से टूट पड़ते हैं सो हमने बच्चों को साफ बता दिया था कि कोई बच्चा खाने की कोई भी चीज़ अपने पास नहीं रखेगा। लेकिन कुछ ही देर में मैंने नोट किया कि बन्दर हमारे आसपास मंडरा रहे थे। मैंने बच्चों से सख्ती से पूछा तो एक बच्चे की जेब से बिस्किट्स निकले। जिनको तुरन्त उन बंदरों ने झपट लिया।
पास में ही एक बड़ा लड़का हीरो बनने के चक्कर में अपने हाथ में चने रखकर बंदरों को खिला रहा था। उसके साथी मोबाइल में उसकी वीडियो बना रहे थे। बंदरों ने झटपट चने खाकर पहले तो उस लड़के को घुरकी दिखाई और बाद बड़ी ज़ोर से उसको बांह पर काट खाया जिससे उसकी शर्ट फट गई और बाजू का मांस बाहर लटक गया। हमारे बच्चे ये सब देखकर सहम गए। हमने जल्दी से मन्दिर में मत्था टेका और वहां से खिसकने में भलाई समझी।
जाखू मन्दिर के पास ही बच्चों को एक दुकान में गरमा-गरम चाय और पकौड़े खिलाए। बच्चे खुश हो गए। वापस शिमला आकर हम शीघ्र स्टेशन के लिए चल पड़े जहां से तारादेवी के लिए ट्रेन थी। स्टेशन से पता चला कि इस वक़्त कोई पैसेंजर ट्रेन नहीं थी। सो हम जल्दी से बस स्टैंड पहुंचे और वापस आते-आते शाम हो गयी थी। हम बच्चों को लेकर सीधे भोजन करने पहुंच गए।
भोजनोपरांत सब प्रतिदिन की तरह कैम्प फायर के लिए एकत्र हुए और वहाँ मैंने ‘छोड़ो कल की बातें’ गाना सुनाया जिसको पर्याप्त तालियां मिलीं। फिर सब सो गए। शरीर थके होने से बिस्तर पर पहुंचते ही सवेरा हुआ मिला।
*****

तारादेवी यात्रा–5 (वापसी)

26 को वापसी थी इसलिए सवेरे सबका नाश्ता पैक करके दे दिया गया और बच्चों को लेकर हम इस बार सुरंग के रास्ते तारादेवी स्टेशन पर पहुंच गए। ठंड लग रही थी। सबने टिकट ली और ट्रेन के आनेपर सब उसमें चढ़ लिए। 11.30 से चलकर 4 बजे कालका हम उतर गए जहां से पानीपत के लिए 5 बजे पानीपत के लिए एकता एक्सप्रेस में हम सवार हो गए। पानीपत पहुंचते-पहुंचते साढ़े आठ बज गए और जब तक हमारी गाड़ी रुकती पिल्लूखेड़ा जाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म से सरकने लगी थी। मैं बच्चों को लेकर ट्रेन के पीछे दौड़ा, गार्ड को मिन्नत भी की लेकिन ट्रेन नहीं रुकी और हम मायूस होकर स्टेशन से सड़क पर चल दिये वहां से काफी देर बाद एक निजी वाहन से हमें घर तक लिफ्ट मिली और रात 12 बजे के करीब हम घर पहुँच कर सो गए।
इस प्रकार मेरी पहली और रोमांचकारी तारादेवी/स्काउट ट्रेनिंग यात्रा सम्पन्न हुई।

-निम्बल

Wednesday, November 30, 2011

मेरा वो रसीला आम...

नर्सरी में था मैं.अभी नया-नया स्कूल जाने लगा था. नयी वर्दी,नया बस्ता,नया माहौल, यानि मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. बस एक बात सही नहीं लग रही थी कि जो भी करो मास्टरनी जी से पूछ के करो,हुंह!! खैर गर्मियों के दिन थे,आमों का मौसम. मैं आधी छुट्टी में पापा के पास दुकान पर ही आ जाता.हमारी मिठाई की दुकान हुआ करती थी.वहां से मेरा स्कूल कुछ गज दूर ही था.मैं खाना खाता और कुछ मीठा खाकर स्कूल दौड़ जाता.ऐसे ही एक दिन जब मैं वापस स्कूल जा रहा था तो पापा ने सीजन का तोहफा एक दशहरी आम(काफी बड़ा और रसीला) मुझे ले कर दिया और मैं उसे थोडा थोडा खाते हुए स्कूल चला गया.मैंने दूर से ही देखा के कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं खेल रहा था.
मैंने सोचा स्कूल की छुट्टी बंद हो गई है, मैं घबरा गया,मैं आम को लेकर उलझन में पड़ गया के उसका क्या करूं? उसे मैं इतनी जल्दी खा तो नहीं सकता था और स्कूल में ले जाते डर लगता था के कहीं टीचर जी से मार न पड़ जाए.मुझे आव और ताव दोनों ही देखने का वक़्त नहीं मिला. मैंने आम को हसरत भरी निगाह से देखा,आँखों से चूसा और...और  फैंक दिया नाली में................. मैं भाग कर स्कूल के अंदर गया तो देखा सभी बच्चे खेल रहे थे.
मैं सकते में आ गया, यानि मैंने बिना वजह के वो मीठा, रसीला आम नाली में फैंक दिया था? कितना बुद्धू था मैं.बिना आगा पीछा देखे आम को फैंक डाला.मैं दौड़ के बाहर नाली के पास आया,उसमे वो आम अभी आधा ही डूबा था.मगर धीरे-धीरे आम नीचे जा रहा था और मेरी आँखों से आंसू भी.
खैर बरसों बीत गये, अनेक गर्मियां आई और गयी,बहुत सारे आम मैंने खाए. दशहरी भी और सफेदा भी. मगर जो मिठास उस आम में थी वो न दोबारा किसी आम में मुझे मिली न मैं आज तक उसे भूल पाया हूँ. अब चाहे कोई मुझे कितने ही आम दे दे मगर उस आम को खोने का दर्द मुझसे नहीं भूला जाता.

Friday, September 30, 2011

कहाँ खो गयी,हंसी तुम्हारी?


कहाँ खो गयी
हंसी तुम्हारी,
कौन ले गया?


शशिमुख ऊपर
मैलापन सा
कौन दे गया?


कल तक
जब तुम
मुस्काते थे


मादकता
हर इक के मन में,
भर जाते थे.


दंत पंक्ति
जब तुम उज्ज्वल
दिखलाते थे.


अंतस तक के
घोर अँधेरे
मिट जाते थे.


सूनापन सा
कैसा मुख पर
अब छाया है.


रूखा सा
व्यवहार तुम्हारा
हो आया है.


लाली चेहरे वाली
आखिर
कौन ले गया.


नयन कुटी में
गहन उदासी
कौन दे गया.

Saturday, September 10, 2011

कब तक तड़पूं ?

कब तक तड़पूं ?
कितना तड़पूं ?
कोई बताये....
राह सुझाये....
कितना सह लूँ ?
कब तक बहलूँ ?
बहुत हो चुका...
बहुत खो चुका.
कहा कुछ नहीं
सहा बहुत है.
रहा कुछ नहीं
गया बहुत है.
कितना समेटूं?
कब तक सहेजूँ?
कोई सिखाये.....
मुझे बताये.

Monday, June 13, 2011

तेरी याद ने आना छोड़ दिया

तेरी याद ने आना छोड़ दिया,
बेवक्त सताना छोड़ दिया.
ऐसा तो नहीं के भूल गये,
बस लब तक लाना छोड़ दिया.
मुश्किल है तुम बिन जीना पर,
दुनिया को बताना छोड़ दिया.

V. B. Series

Friday, February 11, 2011

आइये प्रोमिस करें.

नीचे कुछ तस्वीरें हैं जिन्हें देख के शायद आप भगवान से शिकायतें करना छोड़ दें.
हो सकता है कुछ लोगो को मेरा ये प्रयास निरर्थक लगे या इन तस्वीरों से घिन आए.
मगर मेरा मन तो बहुत विचलित हो गया ये सब देख कर.आईये आज से हम कुछ
ऐसा करना शुरू कर दें जिनसे किसी ना किसी रूप में हम इन बेबसों और लाचारों की
मदद कर सकें.
इन्हें खाने में स्वाद की नहीं बल्कि खाने की जरुरत है
मेरी मौन श्रद्धांजलि
इनको फैशन से सरोकार नहीं.
कभी सोचा है के ये अपना जीवन कैसे बिताते हैं?
माँ
माँ
दो भूखे
क़यामत
शिकायत है इनको भगवान से
गरीबी
अभाव
बेबसी



इन्हें देखें और विचार करें कि हम भगवान से इस बात कि शिकायत करें कि नहीं कि आज आपको पित्ज़ा मजेदार नहीं लगा,आज आप गाड़ी तेज़ नही भगा पाए,आपको अपनी जींस पसंद नहीं,आपके बाल झड रहे हैं,ब्राड-बैंड की  स्पीड कम है...........आदि.

आज है प्रोमिस डे.
आइये प्रोमिस करें.

Monday, February 07, 2011

क्या संसार बचेगा?

(नास्त्रेदमस)
टी. वी. पर अक्सर चर्चा आती रहती है कि क्या संसार बचेगा? माया कैलंडर और नास्त्रेदमस के अनुसार 28 दिसम्बर 2012 को संसार नष्ट हो जायेगा.
माया लोग कोलंबस की 1482 में अमरीकी खोज तक भारत से 10 गुना बड़े एरिया पर हजारों बरसों तक राज करते रहे.उन्हें यूरोपीय गोरों ने जमीन व सोने के लालच में स्पेनी लुटेरे सेनापति पिजारो ने समाप्त कर दिया. उन्होंने खुद का विनाश 200 वर्ष पूर्व देख लिया था. फिर 1520 में फ्रांसीसी भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी सामने आई.पहले यूरोपीयन भारत को ओरिएंट कहते थे.उन्होंने लिखा है 1950 के बाद ओरिएंट (भारत) में एक शक्तिशाली महिला शासक आएगी.बाद में पतन का शिकार होगी.फिर विरोधियों की फूट से दोबारा सत्ता में आएगी.वह 67 वर्ष की आयु में अपने घर में अपने अंगरक्षकों द्वारा मारी जाएगी.तब सदी बदलने में 16 वर्ष  रह जायेंगे.
1520 में इंदिरा जी व उनके पूर्वजों पंडित जवाहर लाल नेहरु,मोती लाल नेहरु व गंगाधर का नामो निशान तक नहीं था.उसने हिटलर व उसके कारनामों को 400 वर्ष पूर्व ही लिख दिया था.नाम हिस्टर लिखा.फिर लिखा कि नये देश (अमेरिका) के न्यूयार्क शहर में दो धातु के पक्षी चौरस मीनार जैसे खम्बों जैसी इमारतों से टकरायेंगे और नष्ट कर देंगे.उत्तर का मंगोल देश (चीन) अति शक्तिशाली बन कर दूसरों का जीना हराम कर देगा.उसको ओरिएंट (भारत),नया देश (अमेरिका) व रूस मिलकर हराएंगे.संसार का भयानक विनाश होगा.क्या कोई 25 वर्ष पूर्व सोच सकता था कि चीन 25 वर्ष बाद अर्थात 2010 में संसार की दूसरी आर्थिक और तीसरी सैनिक शक्ति बन जायेगा?
इस्लाम का भी पक्का विश्वास क़यामत में है.उनके ग्रंथों में क़यामत का काफी ज़िक्र है.बाईबल की कहानियों में भी क़यामत का काफी वर्णन है.यह भी कहा गया है कि क़यामत आती जाती रहेगी.
आबादी अंधाधुंध बढ़ रही है.हर 22 वर्ष में डबल हो रही है.1947 में हम 20 करोड़ थे आज 135 करोड़ हैं.तब जिस जमीन पर 1 आदमी था आज 7 हैं और 2032  मे 14 होंगे.
पंजाब के महाबली महाराजा रणजीत सिंह का राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी से रोपड़ की संधि के बाद तय हुआ था.वर्तमान पकिस्तान का सिंध व बलूचिस्तान का कुछ भाग छोड़ कर सारा पकिस्तान जैसे सिंध,बलूचिस्तान,पंजाब,दर्रा खैबर तक सूबा सरहद,जम्मू-कश्मीर,गिलगित,हुजा,चित्राल,लद्दाख,भारतीय पंजाब के जिले अमृतसर,जालंधर,होशियारपुर.इनमे टोटल 69 लाख की आबादी थी.आज उसी एरिया में 16 करोड़ की आबादी है.
(प्लेग)
मान लो क़यामत आती नहीं तब तो और भी बुरा हाल होगा.पिताजी बताते थे कि उनके बचपन में हर 10 वर्ष बाद महामारी फैलती थी.दो को जला कर आते थे तो तीन और जलाने/दफनाने को तैयार मिलते थे.दस वर्ष में बड़ी आबादी साफ़ हो जाती थी. हैजा,चेचक,टाईफाईड,पीलिया,प्लेग का इलाज ना होने से भरी संख्या में लोग मारे जाते थे.
फिर फ़्रांसिसी सूक्ष्म जीव विज्ञानी डॉ.लुइ पास्चर और अंग्रेज डॉ. अलेक्सांद्र फ्लेमिंग की पेनिसिलिन व दूसरी एंटीबायोटिक  की खोजों ने अचानक मृत्यु दर घटा दी.सर्जरी ने भी मृत्यु दर घटाने में योगदान दिया.तब हर व्यक्ति 10 -12 बच्चे पैदा करता था फिर भी कई परिवारों में दीया-बत्ती करने वाला कोई न बचता था.आम तौर पर 1 -2 ही बचते थे.
जमीन के अन्दर खदानों में लोहा,ताम्बा,जिस्ट,अल्युमिनियम,टाइटेनियम,सोना,चांदी,हीरे,पेट्रोलियम,कोयला ज्यादा नहीं बचे हैं.80 % बिजली कोयले से बनती है.कोयले की कमी है.कूओं के अंदर CNG का दबाव कम हो रहा है.पहाड़ों पर बर्फ कम पड़ रही है.ग्लेशियर पिघल रहे हैं,डैम सूखे का सामना नहीं कर पाते.पनबिजली जरुरत के अनुसार बढ़ नहीं सकती.2010 में पृथ्वी ग्रह 700 करोड़ की आबादी से त्राहिमाम कर रहा था.2020 में 1000 करोड़ को कैसे झेल पायेगा?
मान लो डॉ. नारमन बोरलाग जिसने 1963 में ज्यादा उपज वाला मैक्सिकन गेहूं का बीज बनाया था,उसका नया भाई आ जाये तो भी हम कुछ नहीं कर पाएंगे.ज्यादा तरल नाइट्रोजन के लिए बिजली कहाँ से लायेंगे ? पोटाश,फास्फोरस,गंधक ज्यादा कहाँ से लायेंगे? कीड़ेमार व खरपतवार नाशक क्लोरो,फ्लोरो,ब्रोमो के योगिक कहाँ से लायेंगे ? 1950 में पानी 10 फुट था आज 200 फुट है कल 300 फुट नीचे होगा.इसे निकालने को बिजली कहाँ से लायेंगे?
(पुरानी दिल्ली)
कीमतों का अंदाज़ा लगायें.1947 में गेहूं रुपये का चार सेर,सब्जी 10-15 पैसे सेर,लकड़ी जलावन 15 पैसे सेर,दाल 3 पैसे  सेर,मिटटी का तेल 4 रु. लीटर, पेट्रोल 3 रु. लीटर.1970 में दूध 1 रु. किलो,घी 5 रु. किलो,सोना 180 रु. तोला,1956 में बिजली 4 आने यूनिट थी आज 6.5/रु. यूनिट.1965 में शाहदरा दिल्ली में जमीन 8 आने गज आज 1.25 लाख रु. गज और शाहदरा सी.बी.डी. 3.5 रु.लाख गज.तब पंजाबी बाग़ 8 रु. गज आज 7 लाख रु. गज,सुन्दर नगर 7 लाख रु. गज,चाणक्य पूरी 20 लाख रु. गज कनाट प्लेस घरेलु 18 लाख रु. गज,व्यापारिक 30 लाख रु. गज.आज दूध 26 रु. किलो,घी 400 रु. किलो,उड़द घोटू 85 रु. किलो,असली हींग 10 हज़ार रु. किलो है.
1835 में भारत में सबसे ज्यादा तनख्वाह महाराजा रणजीत सिंह के फौजी की 5 रु. प्रतिमास थी.महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद उनके राज्य पर कब्जा करने के बाद महाराजा गुलाब सिंह और ईस्ट इंडिया कम्पनी की संधि के बाद सारा जम्मू कश्मीर,गिलगित,हुजा,चित्राल और लद्दाख सिर्फ 70 लाख रु. में कम्पनी ने महाराजा गुलाब सिंह को बेच दिया था.आज जम्मू या श्रीनगर में कई इमारतें 100-100 करोड़ की हो चुकी हैं.10-20 करोड़ वाली इमारतों का तो हिसाब ही नहीं.
गरीब व निम्न वर्ग दिन में कई बार मरता है.वह कहता है कि कल कि क़यामत आज आ जाये.हर बड़ा आदमी,पैसे और साधन वाला आदमी कभी भी क़यामत नहीं चाहेगा.पर होगा वही जो मंजूरे ख़ुदा होगा.


-----विद्या भूषन जैन.

For all my readers


Tuesday, February 01, 2011

जब भी लौट के तुम आओगे

एकांत मिला जब भी पल भर का,
उतर आए तुम ही आँखों में.
कागज़ ऊपर फैल गए तुम,
श्याम रूप धर कर स्याही का.


देखा जब जिस और भी मैंने,
मुझे घूरते पाया तुमको.
रहा भागता तुमसे हरदम,
मन से निकल नहीं पाए तुम.


अब भी दिल को समझाता हूँ,
कभी तो मुझको अपनाओगे.
जब भी लौट के तुम आओगे,
वहीँ खड़ा मुझको पाओगे.

V.B. Series

Monday, January 31, 2011


-------------ठाकुर गोपाल शरण सिंह

मेरा एक दोस्त है दोस्तों.

मेरा एक दोस्त है दोस्तों.
मैं उसका नाम तो नहीं लिखूंगा मगर प्लीज़ आप समझ जाना के वो कौन है .
वो बहुत ही खूबसूरत है,जैसे मेरे कान्हा जी,
बहुत समझदार है,जैसे सभी होते हैं,
बहुत अच्छा है,जैसे मैं खुद हूँ
और उसका दिल....................दिल तो जैसे संगमरमर का बना है.
सफ़ेद,पवित्र और पत्थर.
उसकी आत्मा जैसे ओस की बूँद जैसी है,निर्दोष,निर्मल और ठंडी.
मुझे वो बहुत पसंद है क्योंकि मैं  उससे प्यार करता हूँ.
उसको मैं पसंद नहीं क्योंकि मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ.
उसको मैं पहले पसंद था क्योंकि उसे ये पता नहीं था के मैं उसको कितना प्यार करता हूँ,
मगर जैसे-जैसे उसे पता लगा के मैं उसे कितना चाहता हूँ वैसे-वैसे वो मुझसे दूर होता गया.
वैसे उसकी कोई गलती हो ऐसा मैं नहीं मानता क्योंकि मैं ही उसे हमेशा जताता रहता था के मैं उससे कितना प्यार करता हूँ.
उसने कभी नहीं बताया के वो भी मुझसे प्यार करता है के नहीं.
मुझे कुछ समझता भी है के नहीं.
वो हमेशा मेरी कमजोरियां मुझे गिनाता रहा,मेरी गलतियाँ मुझे बताता रहा,मेरी मानसिकता में दोष ढूंढता रहा.
इस सबमें उसे ये तो कभी दिखा ही नहीं के मैं आखिर उससे प्यार भी तो बहुत करता हूँ.
अब प्यार करने के नाते कभी मैंने कुछ शरारत कर दी तो मेरी मानसिकता ख़राब,मैंने कुछ कह दिया तो मेरी मानसिकता गलत,

Friday, January 21, 2011

कह तो देता तुमसे मगर.........

कह तो देता तुमसे मगर.........
के तुम्हारी ख़ामोशी परेशान करती है,
तुम्हारी बेरुखी सताती है.
न बोलना तुम्हारा दुःख पहुंचता है.
कह तो देता तुमसे मगर.............

तुमसे दूर रहना अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारा मुझसे वो बेसाख्ता लिपटना याद आता है.
हवा में घुली तुम्हारी खुशबु मुझे सांस नही लेने देती.
कह तो देता तुमसे मगर.........

जी में आता है बहुत बार के भूल जाऊं सब कुछ,
न कुछ बोलू न कुछ सुनु.
लिपट जाऊं तुमसे और मूँद लूँ  आँखें.
मुझे मिल जाए माफ़ी....
कह तो देता तुमसे मगर.........

अब भी शाम होते ही मैं तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ,
तुम्हे देख कर सीने मैं अब भी कुछ चुभता है.
तुम्हारी मोहक मुस्कान दिल में अब भी सुलगती है...
कह तो देता तुमसे मगर.........


उन सवालों का जवाब नहीं मिला अब तक,
खामोश रह कर जो तुम किया करते थे.
नहीं सहन होता अब तुम्हारा ये गूंगा शोर....
नहीं देखा जाता खुद को आईने में..
कह तो देता तुमसे मगर.....

तुम तो भूल भी गये होगे मेरे प्यार को
मैं कैसे समेटूं अपना बिखरापन..
मेरे अँधेरे वीराने में चमकती है,
तुम्हारे दूधिया दांतों की सफेदी..
कह तो देता तुमसे मगर...

सपनों से डर के सोता नहीं मैं,
अपनों के डर से रोता नहीं मैं,
जमाने से डरता हूँ,
मगर तुम पे मरता हूँ..
कह तो देता तुमसे मगर.


V.B. Series

Wednesday, January 19, 2011

तुम क्यूँ न हुए मेरे ........

तुम बिन जीना मुहाल,
तुम बिन मरना भी मुश्किल.
आँखों की उदासी सब कह दे,
जो न कह पाया ये दिल.
दिल ने तो सब कह डाला था,
पर तुम ही समझ नहीं पाए.
वो लफ्ज़ नहीं तुम सुन पाए,
जो लफ्ज़ जुबां तक न आए.
क्या करूँ शिकायत अब तुमसे,
जब फर्क नहीं पड़ने वाला.
कोरी पुस्तक के लिक्खे को,
है कौन यहाँ पढने वाला.
भीगी आँखें जो पढ़ न सका,
वो कहा सुना क्या समझेगा.
बस अपने मन की कह देगा,
बस अपने मन की कर लेगा.
कुछ नहीं पूछना है तुमसे ,
उपकार बहुत मुझ पर तेरे,
बस इतना मुझको बतला दो....
तुम क्यूँ न हुए मेरे...
तुम क्यूँ न हुए मेरे .........

V.B. Series.

मैंने देखा है

*कभी देखा है तुमने ?
दर्द को कम होते !
किसी की पीड़ा को मिटते !
कैसे भूल जाता है कोई नासूर बने  दर्द को पलभर में.
कैसे मिल जाता है अवकाश किसी को बरसों की पीड़ा से !
मैंने देखा है खुद ही में ये सब
तुम्हारी मोहक हंसी जब गूंजती है कानों में,
जाने कहाँ चला जाता है दर्द,
जाने कहाँ भाग जाती है पीड़ा.
तुम्हारे दूधिया दांतों की चमक के नीचे
मैंने पीड़ा को पिसते देखा है.
तुम्हारी खनकदार हंसी को सुनकर
मैंने दर्द सिकुड़ते देखा है.*


V.B. Series.

Saturday, January 08, 2011

तुमको चाहना हम से और नहीं होगा....

तुमको चाहना हम से और नहीं होगा,
जलते रहना हम से और नहीं होगा.

तेरे बिन रहना तो अब भी मुश्किल है,
रोयेंगे पर ज़रा भी शोर नहीं होगा.

तुम जो कह दो तो मैं चाँद तोड़ लाऊं,
पर मेरा तुम पे उतना ज़ोर नहीं होगा.

छोड़ के दुनिया तुमको आज बता देंगे,
चाहने वाला हम-सा और नहीं होगा.

कोई तुम से कह दे, हम नहीं मानेंगे,
जलना बुझना बस अब और नहीं होगा.

तेरी नफरत अगर नहीं घट पायी तो,
प्यार हमारा भी कमज़ोर नहीं होगा.

पता चलेगा तुमको तब तन्हाई का,
विक्की जैसा जब कोई और नहीं होगा.





V.B. Series

Thursday, December 16, 2010

इस बार गिरेगी धुंध..........

इस बार गिरेगी धुंध,
तो मैं तुम्हें ख़त लिखूंगा.
तुम मेरे देश चले आना.
मैं तुम्हारी पसंद के रंग,
आसमान से चुरा कर,
रख लूँगा सहेज कर.
जब भी तुम आओगे,
मैं उन्हें तुम्हें सौंप दूंगा.
धुंध,कोहरा,कुहासा,
सफ़ेद भूरा चांदनी सा.
जब उतरेगा ज़मीन पर,
तुमको ढूंढूंगा  उसमे टटोल कर.
तब क्या तुम छू दोगे मुझे ?
शायद नही.
और यूँ अकेला खड़ा रहूँगा मैं.
धुंध में,कोहरे में,कुहासे में.
तब तुम मेरे एहसासों को समेट  लेना
और देना एक वायदा बस,
कि तुम सालों साल...
आते रहोगे हर धुंध के
गुलाबी मौसम  में.
और मैं हर साल,
लिखता रहूँगा तुम्हे ख़त,
इसी तरह............

V.B. Series

Sunday, December 12, 2010

भूलना उसको मुश्किल था पर...............

थी राह कठिन उस तक वापस  जाने की,
हो गयी इन्तिहाँ खुद को बहलाने की.
दिन को न चैन था रातों को न सो पाता था,
जो वक़्त मिला तो खुद को समझाता रहता था.
कभी न समझा उस बिन अब में जी सकता हूँ,
कच्चे धागे से टूटा दर्पण सी सकता हूँ.
अब खुली आँख तो देखा वो तो कहीं नहीं है,
खुशियों से लेकिन राह अभी तक भरी पड़ी है.
जो नहीं भाग में हो उसका फिर क्या रोना है,
रो-रो के तो बस मिले हुए को ही खोना है.
गुनगुनी धूप सा जीवन अब तक बहुत पड़ा है,
खोल के बाहें जीवन अब भी वहीँ खड़ा है.
गर कर पाया तो जीवन सोने सा कर लूँगा,
जो ख्वाब अधूरे थे उनको पूरा कर लूँगा.
इक नयी सुबह अलसाई मुझको ताक रही है,
काली रात अमावास सरपट भाग रही है.
हँसते मुस्काते रहने का अब सोच लिया है,
रूठा रूठा चेहरा अब पीछे छूट गया है.
हो गयी है आदत उससे इतना दूर रहा हूँ,
भूलना उसको मुश्किल था पर..................
भूल रहा हूँ.


V.B. Series.

कैसे बताऊँ तुम्हें?...............


मेरे प्यार की गहराई बढती जाती है लगातार
इसी के साथ पवित्र होती जाती हैं मेरी भावनाएं.
पल-दर-पल,समय-दर-समय,
जिंदगी आसान  सी होती जाती है
और मैं ये कह सकता हूँ कि
तुम्हारे लिए मेरा प्यार बढ़ता ही जाता है.

हमने संजोये बहुत से सपने और
उन्हें सच कर दिखाया.
हर क़दम के साथ हमारी नजदीकियां बढती गयी
और आज मेरे दिल में तुम हो....बस तुम.

अगर वाकई मापना चाहते हो
मेरी सच्चाई !
तो देखो मेरी आंखों में,
जो देंगी गवाही
और तुम वाकई जान जाओगे कि
मुझे तुमसे प्यार है.

मेरा प्यार तुम्हारे लिए नित नई आभा धरता है
हर सुबह नई आशा के साथ उगता सूरज
नये दिन के लिए नई आशा,
नई ख़ुशी लेकर आता है.
मेरे जीवन का वो नया सूरज तुम हो,
जो हर पल को नई खुशियों से भर देते हो.

मेरा प्यार तुम्हारे लिए भोर की अछूती किरण
की तरह पवित्र है और उसी की तरह सच्चा भी.
जैसे एक फूल की खुशबू,
ओह्ह ! कितने-कितने तरह से मैं तुम्हें चाहता हूँ........
कैसे बताऊँ तुम्हें?


V .B. Series.

Thursday, November 04, 2010

इस बार उजाला भीतर हो...........

मन द्वार सजा हो तोरण से
मन-आँगन सजे रंगोली से,
मन-मंदिर पावन ज्योति,
इस बार उजाला भीतर हो.

अंतस के गहन अँधेरे में,
धुंधली पड़ती पगडण्डी पर
बस एक नेह का दीप जले,
इस बार उजाला भीतर हो.

रिश्तों की उलझी परतों में,
उजली किरणों का डेरा हो,
हर मुख चमके निश्छल उज्जवल,
इस बार उजाला भीतर हो.

पिछली,बिखरी,उजड़ी,कडवी
बिसरें स्मृतियाँ जीवन की
अब नए स्वरों का गुंजन हो,
इस बार उजाला भीतर हो.

जीवन यात्रा के शीर्ष शिखर
आशीष भरे जिनके आँचल,
छाया दे हर नव अंकुर को,
इस बार उजाला भीतर हो.

प्रतिपल जीवन में उत्सव हो
हर दीप तेल और बाती का,
स्नेह पगा गठ बंधन हो,
इस बार उजाला भीतर हो.

साकार बने अब हर सपना,
अपनेपन का आकार बढे,
अब सब अपने ही अपने हो,
इस बार उजाला भीतर हो.



----प्रवीण उमेश मल्तारे
     भोपाल मध्यप्रदेश.