Wednesday, November 30, 2011

मेरा वो रसीला आम...

नर्सरी में था मैं.अभी नया-नया स्कूल जाने लगा था. नयी वर्दी,नया बस्ता,नया माहौल, यानि मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. बस एक बात सही नहीं लग रही थी कि जो भी करो मास्टरनी जी से पूछ के करो,हुंह!! खैर गर्मियों के दिन थे,आमों का मौसम. मैं आधी छुट्टी में पापा के पास दुकान पर ही आ जाता.हमारी मिठाई की दुकान हुआ करती थी.वहां से मेरा स्कूल कुछ गज दूर ही था.मैं खाना खाता और कुछ मीठा खाकर स्कूल दौड़ जाता.ऐसे ही एक दिन जब मैं वापस स्कूल जा रहा था तो पापा ने सीजन का तोहफा एक दशहरी आम(काफी बड़ा और रसीला) मुझे ले कर दिया और मैं उसे थोडा थोडा खाते हुए स्कूल चला गया.मैंने दूर से ही देखा के कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं खेल रहा था.
मैंने सोचा स्कूल की छुट्टी बंद हो गई है, मैं घबरा गया,मैं आम को लेकर उलझन में पड़ गया के उसका क्या करूं? उसे मैं इतनी जल्दी खा तो नहीं सकता था और स्कूल में ले जाते डर लगता था के कहीं टीचर जी से मार न पड़ जाए.मुझे आव और ताव दोनों ही देखने का वक़्त नहीं मिला. मैंने आम को हसरत भरी निगाह से देखा,आँखों से चूसा और...और  फैंक दिया नाली में................. मैं भाग कर स्कूल के अंदर गया तो देखा सभी बच्चे खेल रहे थे.
मैं सकते में आ गया, यानि मैंने बिना वजह के वो मीठा, रसीला आम नाली में फैंक दिया था? कितना बुद्धू था मैं.बिना आगा पीछा देखे आम को फैंक डाला.मैं दौड़ के बाहर नाली के पास आया,उसमे वो आम अभी आधा ही डूबा था.मगर धीरे-धीरे आम नीचे जा रहा था और मेरी आँखों से आंसू भी.
खैर बरसों बीत गये, अनेक गर्मियां आई और गयी,बहुत सारे आम मैंने खाए. दशहरी भी और सफेदा भी. मगर जो मिठास उस आम में थी वो न दोबारा किसी आम में मुझे मिली न मैं आज तक उसे भूल पाया हूँ. अब चाहे कोई मुझे कितने ही आम दे दे मगर उस आम को खोने का दर्द मुझसे नहीं भूला जाता.

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